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तथ्य कई हैं पर सत्य एक है.

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ज़रा सोचिये कुछ हटकर ........ कुछ अच्छा .......... कुछ देश के लिए

Posted On: 16 Feb, 2015 Others,social issues,Others में

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हो सकता है जिस विषय को मैं उठा रहा हूँ वो निरर्थक हो. लेकिन फिर भी मैं इस विषय को आजतक नहीं समझ पाया की आज़ाद भारत के राज्यों का बंटवारा किस प्रकार हुआ. कैसे तमिलनाडु की सीमायें निश्चित हुईं तो कैसे आन्ध्र, पंजाब गुजरात महाराष्ट्र आदि की सीमाएं बनीं. क्या राज्य बनाते समय भी देश की एकता, अखण्डता और संप्रभूता का परस्पर ध्यान रखा गया था या केवल राजाओं की रियासतों और उनके मनमाने आचरण के आधार पर भारत संघ में उनको सम्मिलित कर रियासतों को मनमानी आज़ादी दे दी गयी.


आज जब मैं देखता हूँ की दक्षिण भारतीय लोग उत्तर भारतियों को मराठी बिहारियों को बंगाली पंजाबियों को हेय दृष्टि से देखते हैं तो बरबस एक ही ध्यान जाता है की सभी राज्य अपनी भाषा और संस्कृति को अधिक महत्त्व देते हैं और दूसरे राज्य को कमतर समझते हैं. यही कारण है देश में बढ़ते क्षेत्रवाद का, जिसका फायदा राजनैतिक लोग अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए करते हैं, जनता को क्षेत्रवाद में बांटकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, . और हम आज तक ये चाल समझ नहीं पाए हैं और अपने आप को अलग अलग क्षेत्रों में बांटे हुए हैं. कोई बिहारी है तो कोई गुजराती, कोई राजस्थानी है तो कोई हरयाणवी ……….. ! सब बंटे हुए हैं कोई भारतीय नहीं है.


क्यों राज्यों को भाषाओं के आधार पर बनाया गया ? क्यों राज्यों का महत्त्व देश के वजूद पर भारी पड़ा ? ये एक गंभीर विषय है, या हो सकता है हमारे निति नियंताओं ने सकारात्मक सोचते हुए ये निर्णय लिए हों और क्षेत्रवाद को गौण मान लिया हो. लेकिन धीरे धीरे आई राजनैतिक गिरावट और नेताओं की सत्ता लोलुपता ने क्षेत्रवाद को पनपने, फलने फूलने का मौका दे दिया. कल्पना कीजिये यदि हर राज्य में सभी भाषाओं को बोलने वाले लोग होते साझा संस्कृति होती तो वो अपनी पहचान राज्य के आधार पर नहीं बताते. यदि सभी लोगों को सभी राज्यों में सांस्कृतिक तौर पर जोड़ा जाता तो हम सांस्कृतिक और भाषाई आधार पर न बंटते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आज हम बंटे हुए हैं.


आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे की मैं शायद तुगलकी अंदाज में सोच रहा हूँ, परन्तु ज़रा सोचिये की आज़ादी के बाद से ही राज्यों को सीधी रेखा बनाकर और लगभग जनसँख्या घनत्व के अनुसार बनाया जाता तो सभी राज्यों को आगे बढ़ने के बराबर अवसर होते ………. !


और यदि आज की ही स्थिति रखनी थी तो जितनी भी राज्य सरकारी, निगमों और अन्य क्षेत्रों में नौकरियाँ होतीं, उनमें सभी राज्यों का सभी राज्य की नौकरियों में निश्चित मात्रा में आरक्षण होता, जैसे १०० नौकरिया निकलीं तो सभी राज्यों को बराबर अनुपात में मिल जातीं, इस से अत्यधिक जनसंख्या का एक दुसरे राज्य में स्थानान्तरण होता लोगों को एक दुसरे के साथ रहने का अवसर मिलता और धीरे धीरे लोगों के मन से क्षेत्रवाद निकल जाता लोगों में परस्पर सहयोग की भावना बढती.


ज़रा सोचिये यदि नौकरियों के साथ ही सभी लोगों को वैवाहिक संस्कार भी उसी राज्य में करने होते जिसमें वो नौकरी कर रहे हैं तो क्षेत्रवाद के साथ साथ जातिवाद पर भी लगाम लगती. एक पंजाबी की शादी तमिल से एक बंगाली की शादी उत्तर भारतीय से सभी की संस्कृति एक दुसरे से जुड़ जाती और कोई भी अपने आप को भाषाई और सांस्कृतिक तौर पर अलग महसूस नहीं करता ………! ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन काल में राजा महाराजा शक्ति संतुलन बनाने के लिए एक दुसरे राज्य से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते थे ……… हम एक राष्ट्र को बनाए रखने के लिए ऐसा करते …………! फिर कोई भी व्यक्ति अलग भाषा या संस्कृति की बात नहीं करता और न ही नेता लोग भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर बाँट पाते न देश में क्षेत्रवाद की राजनीति होती.


ज़रा सोचिये कैसा होता वो अपना भारत, आज साठ सालों बाद तो सचमुच बदल गया होता . फिर मनसे प्रमुख राज ठाकरे का वजूद न होता, न करूणानिधि की राजनीति चलती और न ही जयललिता की, ममता बनर्जी की दूकान बंद, मुलायम सिंह बहुत ही मुलायम हो गए होते क्योंकि क्षेत्रवाद न होता जातिवाद न होता, न कोई कश्मीरी, न कोई नागा, न कोई असामी, न कोई केरली, सब भारतीय ………..!केवल भारतीय   ……………..

ज़रा सोचिये कुछ हटकर …….. कुछ अच्छा ………. कुछ देश के लिए



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
February 20, 2015

SAHEE KAHA SHREE MUNEESH JEE PICHHLE KUCHH VARSHON SE DEKHA HAI KI METRO SHAHAR ME JANTA JATI DHARM SE UTHKAR VOTE DETI HAI AGAR YAHEE VICHARDHARA POORE DESH ME HO JAAY TO BAHUT ACHCHHA HOGA VARAN DESH ME DO PARTY KA HEE SYSTEM HONA CHAHIYE JATIGAT RAJNITI और क्षेत्रवाद अपने आप ख़त्म हो जाएगी

Shobha के द्वारा
February 19, 2015

श्री मुनीश जी विचारणीय लेख आपने अपने विचारों द्वारा दूसरों को भी सोचने पर विवश कर दिया | लेकिन दिल्ली में विभिन्न भाषा भाषी रहते हैं सब प्रेम से रहते हैं में काफी वर्ष विदेश में रही हूँ वहाँ पाकिस्तान के लोगों की बनती ही सबसे अधिक नार्थ इंडिया के अपने भाषी लोगों से | रिश्तो के सम्बोधन होते थे जैसे ताऊ जी चाचा जी जब की दुश्मन मुल्क थे | लोग अपने भाषा बोलने वालों से बड़ी जल्दी मिक्स हो जाते हैं डॉ शोभा

yamunapathak के द्वारा
February 18, 2015

मुनीश जी सच कहूँ तो इंसान इंसान से सही तरीके से ही पेश आता है यह जातिवाद क्षेत्रवाद सब प्रभुत्ववादीियों की दें है आपका ब्लॉग अतीत्तम है नई सोच की दिशा में एक नया कदम ; यह है मन का नया रूपांतरण साभार

pkdubey के द्वारा
February 17, 2015

आदरणीय आप का आलेख सही है ,पर हीन भावना ही नहीं,लोग आदर से पेश आते हैं ,मैं पिछले १० वर्ष से मुंबई में हूँ,बहुत अच्छे अनुभव रहे ,हाँ राजनेता अवश्य ही विष वमन करते रहते ,पर वो भी धीरे -धीरे ख़त्म हो रहे |

jlsingh के द्वारा
February 17, 2015

आदरणीय मुनीश बाबू, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद आपको इस मंच पर उपस्थित देख मन खुश हुआ साथ ही एक अच्छे विषय पर आपने अपने विचार रक्खे हैं. आपने भाषा और क्षेत्र वाद का ही मुद्दा उठाया है, धर्म को इससे अलग रखने की भरपूर कोशिश की है. … निश्चित ही आपने एक अच्छी राह बताई है अगर लोग इसे स्वीकार करें तो… वैसे बहुत हद तक देखा जाय तो पंजाबी, बिहारी, बंगाली, माड़वारी, और दक्षिण भारतीय भी हर क्षेत्रों में पाये जाते हैं. बाहर सारे धारावाहिक हम हिन्दुस्तानी, तारक मेहता का उल्टा चश्मा आदि में भी यही सनेश देने की कोशिश की गयी है. आपका विचार सराहनीय है, कम से कम मैं तो आपका समर्थन करता हूँ. सादर!

    munish के द्वारा
    February 20, 2015

    आदरणीय सिंह साहब सादर अभिवादन, मैंने धर्म को जानबूझकर इस मसले से दूर रखा, क्योंकि जब हम भारत में धर्म की बात करते हैं तो मुख्यतः दो ही धर्म आते हैं हिन्दू और मुसलमान, कोई माने या न माने लेकिन ये सच है की मुसलमान आक्रांता के रूप में भारत आये, ऐसा नहीं है की मुसलमान ही विदेशी आक्रांता थे बल्कि उनसे पूर्व शक, हुन, पारसी और अन्य भी लोग भी भारत आये लेकिन आज आप उनमें से किसी को नहीं पहचान सकते की वो कौन हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को आत्मसात किया लेकिन मुसलामानों ने अपने आप को एक शाषक और विजेता की तरह ही रखा और आज तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता में रचे बसे नहीं हैं, कहते हैं भारत की गंगा जमुनी तहजीब ………….. ! वो इतिहास का कौन सा कालखण्ड है जब वास्तव में दोनों धर्मों के मानने वालों ने इस तहजीब (जो की मुझे नहीं पता कौन सी है) के अनुसार आचरण किया हो, इसीलिए मैंने धर्म को अपने लेख से दूर रखा .


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