JANMANCH

तथ्य कई हैं पर सत्य एक है.

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ........................!

Posted On: 24 Jan, 2015 Others में

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ये भगवान का ” आत्मा पुनर्जन्म ” विभाग है यहाँ मृत्युलोक से आयीं आत्माओं को पुनः किस रूप में जन्म लेना है ये निश्चित किया जाता है . आमतौर पर यहाँ के अधिकारी जो निश्चित कर देते हैं, आत्मा को उसी रूप में जन्म लेना होता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थिति का हवाला देकर “आत्माएं” शरीर स्थानान्तरण की “अपील” भी कर सकतीं हैं. देखने में आया है की पिछले कुछ समय से इस तरह की “अपील” कुछ ज्यादा ही होने लगीं हैं, उन्हीं अपील पर चर्चा हेतु अपीलीय अधिकारी निर्णय ले रहे हैं, एक अधिकारी सभी आत्माओं की अपील को एक एक कर पढ़ रहा है तथा अधिकारी उस पर निर्णय ले रहे हैं.

अधिकारी पहली अपील पढता है :

महोदय,

मैं मृत्युलोक से अभी अभी आई हूँ मै लड़की ही थी और नए जन्म में भी मुझे कन्या के रूप में ही जन्म लेना है, लेकिन मै कन्या के रूप में जन्म नहीं लेना चाहती हूँ, मृत्युलोक में कन्या के रूप में ही जन्म लिया था, बड़े ही सुन्दर सुन्दर सपनों के साथ मैं वहां गयी थी, मैंने धरती की सुन्दरता की बहुत सी कहानियां सुनीं थीं, वहां की हरियाली, पर्वत, झील नदियाँ ……….. मै देखना चाहती थी वहां की सुन्दरता, मै वहां की हरियाली को निहारना चाहती थी पर्वतों पर घूमना चाहती थी ………. इसी स्वप्न को देखते हुए में कब “गर्भाशय” में पहुंची और कब मेरा एक स्त्री से नाता जुड़ गया मुझे पता ही नहीं चला, फिर धीरे धीरे मुझे पता चला की वो मेरी मां थी, मुझे कुछ कुछ आवाजें आतीं थीं कोई कहता की तेरा भाई आने वाला है तो कोई कहता की मेरा पोता आने वाला है.

……………… मैं बहुत खुश थी की जब मैं जन्म लूंगी तो सब आश्चर्यचकित हो जायेंगे और मुझ जैसी कन्या को पाकर अत्यंत खुश हो जायेगे ……… मैंने गर्भ में ही रिश्ते बनाने शुरू कर दिए थे, पापा जो हर समय मेरे स्वास्थ्य की ओर से चिंतित रहते, मेरी बहने भी थीं जो बड़ी ही उत्सुकता से मेरे साथ खेलने के लिए मेरे जन्म की प्रातीक्षा कर रहीं थीं, मेरी दादी ……. और सब………….. मै देखना चाहती थी अपनी “माँ” का चेहरा ….. बस यूँ ही दिन निकल रहे थे ………… की एक दिन मैंने कुछ आवाजें सुनी “मेरी दादी”……… “मेरे पापा”….. मेरी तस्वीर लेने की बात कर रहे थे, मै सुनकर बहुत खुश हुई की वो लोग मुझे देखने के लिए कितने उत्सुक हैं ……….. लेकिन पता नहीं क्यों माँ तैयार नहीं थी कहती थी की “ऐसा मत करो” मै समझ नहीं पा रही थी, कि भला तस्वीर में क्या बुराई है फिर अगले ही दिन मेरी तस्वीर ली गयी ……………… घर में सन्नाटा सा छा गया था ……….. वो लोग नहीं चाहते थे की में जन्म लूँ ………….. लेकिन मेरी माँ शायद उन्हें मनाने की कोशिश कर रही थी लेकिन मैं निश्चिन्त थी की जब तक मेरी माँ मेरी रक्षा कर रही है मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता …………. कुछ दिन बीत गए ………फिर एक दिन अचानक मुझे कुछ अजीब सा महसूस हुआ, तभी एक कैंची मेरे पास आई मैं घबरा गयी मैंने हाथ पैर मारे परन्तु वहां मेरी रक्षा कौन करता, मैंने कैंची से बचने की बहुत कोशिश की लेकिन उस की पकड़ में मेरा हाथ आ ही गया……… और एक दर्दनाक चीख मेरे अन्दर ही अन्दर घुटकर रह गयी……………. में असहनीय दर्द को सहन करने की कोशिश ही कर रही थी की ……….. कैंची ने मेरे पैर को काट दिया ……….दर्द से में बेहाल थी ………………. मै अन्दर ही अन्दर छटपटा रही थी …….. कुछ समझ नहीं आ रहा था की कैंची फिर आगे बढ़ी इस बार मेरा पेट उसकी पकड़ में आ चुका था ……………….और …और … काट कर दो टुकड़े …………………………………………………………………………………………

मै जन्म से पूर्व ही काल के गाल में समा गयी,………….. ऐसा क्यों हुआ मै आज तक नहीं समझ पायी हूँ, क्यों मुझे नहीं देखने दिया गया धरती की सुन्दरता को …….कल-कल बहते पानी को……… क्यों नहीं महसूस करने दिया मुझे वो ठंडी हवा के झोके ………… न मै अपनी बहनों से मिल पायी और न ही पापा से ………………….. और…… और “माँ”………………….माँ का चेहरा ………….. !

महोदय, वास्तव में मैं मानसिक रूप से अभी कन्या जन्म के लिए तैयार नहीं हूँ, कृपया मेरी अपील पर गौर किया जाए ……. धन्यवाद

सभा में सन्नाटा छा गया, सब शांत बैठे थे कुछ सदस्यों की आँखों में आंसू थे तो कुछ आंसू छुपाने की कोशिश कर रहे थे …….तभी चित्रगुप्त ने सबको संबोधित करते हुए कहा ” सभासदों इस आत्मा के विषय में क्या कहना है ………..!

सब चुप ………….

जवाब दीजिये, ……………………… लेकिन कोई आवाज़ नहीं आई तो उन्होंने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा ” मेरे विचार में अभी इस आत्मा को नया जन्म नहीं देना चाहिए या लड़के का जन्म दे देना चाहिए ……. बाकी जैसे सभासद चाहें ……………. सभी ने चित्रगुप्त जी की बात को स्वीकार किया और उस आत्मा को कन्या के स्थान पर लड़के का जन्म देना स्वीकार कर लिया .

दूसरी अपील पढ़िए ……….

अधिकारी पढ़ना शुरू करता है

महोदय,

मै अभी कुछ दिन पूर्व ही मृत्युलोक से आई हूँ, मैंने कन्या रूप में ही जन्म लिया था, मेरा बचपन कब बीत गया मुझे पता ही नहीं चला मेरे माता पिता मुझे पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाना चाहते थे, मैं भी उनके सपनों को साकार करना चाहती थी, मैं कामयाबी की ऊंचाइयों को छूना चाहती थी और इसी सपने को साकार करने के लिए मेरे माता पिता ने मुझे एक बड़े शहर में पढने भेज दिया, मेरा प्रवेश एक मेडिकल कॉलेज में हो गया था. मैं निरंतर अपने सपनों के करीब पहुँच रही थी, सभी मेरे से बहुत खुश थे मेरे टीचर, मेरे दोस्त, मेरे माता पिटा ……………. बस इंतज़ार था तो मेरे डॉक्टर बनने का, की अचानक एक काली रात ने मेरे सपनों को मौत दे दी ……….. शाम के समय कॉलेज से लौटते हुए कुछ लड़कों ने मुझे ज़बरदस्ती उठा कर अपने साथ गाड़ी में बैठा लिया, और ……….. और मेरे साथ………………….. !

मै चीखती रही चिल्लाती रही लेकिन कोई मुझे बचाने नहीं आया, उस महानगर में एक भी “महामानव” न निकला ……… उन दरिंदों ने मेरे साथ वो खिलवाड़ किया की दरिंदगी की रूह भी कांप जाए ……………………! मैं बहुत रोयी उनके हाथ जोड़े, पर उन दुष्टों ने मुझे नहीं छोड़ा, मै रोते रोते न जाने कब बेहोश हो गयी,…………………… फिर आंखें खुलीं तो मै हॉस्पिटल में थी……………… मेरे सामने मेरे माता पिता थे . वे रो रहे थे……………… मेरी आँखों से भी आंसू बह रहे थे ………..बिस्तर तक भीग गया था …………… पर मेरे मुहं से कोई आवाज नहीं निकल पा रही थी ………..फिर कुछ पुलिस वाले आये ………… वो मुझ से जानना चाहते थे रात का सच………… शायद वो देख नहीं पा रहे थे मेरी या देखना नहीं चाहते थे या फिर कानूनी मजबूरी ………! मैं उनकी किसी बात का जवाब नहीं दे पा रही थी …………………………… फिर मुझे नींद सी आने लगी …………….. मैं सपना देखने लगी उडती हुई पहुँच गयी हूँ उस मुकाम पर जहां पहुंचने का सपना मै बचपन से देखती आई थी………….. लेकिन आँखें खुलीं तो अहसास हुआ की मैं……………. मै तो अब केवल आत्मा हूँ वो मेरा शरीर जिसके भरोसे मै अपने और माता पिता के सपनो को पूरा करना चाहती थी उसे कुछ दरिंदों इस कदर रौंदा था की वो मेरा (आत्मा का ) साथ न दे सका, मैं जीना चाहती थी लेकिन ……………लेकिन………….. !

महोदय मै सचमुच अभी तक असहज हूँ कृपया मुझे यहीं रहने दिया जाए कम से कम कुछ समय ही सही जब तक की मै मानसिक रूप से स्वस्थ न हो जाऊं .

फिर सन्नाटा छा गया ……….

चित्रगुप्त बोले……… ” क्या इस अपील को स्वीकार न करने का कारण किसी सभासद के पास है ”
सभी ने एक स्वर में अपील स्वीकार की और आत्मा के “नए जन्म” को स्थगित कर दिया .

“अब तीसरी अपील है महाराज, लेकिन मै चाहता हूँ की अन्य कोई सभासद इसको पढें, मेरा तो इन दो प्रार्थना पत्रों से ही जी भर आया है ………. ” यह कहकर वो बैठ गए, फिर दुसरे सदस्य ने अगला प्रार्थना पत्र पढ़ा.

महोदय,

मैंने एक मध्य वर्गीय परिवार में जन्म लिया था और अब तो यही कहूँगी की मेरा दुर्भाग्य था की मैंने की मैंने कन्या के रूप में जन्म लिया था, हालांकि मै अपने माँ बाप की लाडली थी, वो मुझे बहुत प्यार करते थे परन्तु आर्थिक तंगी अक्सर हमारी खुशियों में खलल डालती रहती थी फिर भी मेरे हम सबकी सभी जरूरतें पूरी करते थे…….. जिंदगी ऐसे ही चल रही थी की कब मैं बड़ी हो गयी और कब मुझे मेरे अपने ही माँ बाप ने पराई मानकर अनजान हाथों को सौंप दिया ……. पता ही नहीं चला …… एक ही झटके में मेरी दुनिया बदल गयी थी ………. नए घर में मुझे बड़े धूम धाम से ले जाया गया मानो मेरे आने की उस घर वालों को बेहद ख़ुशी हो, और मुझे भी यही बताया गया था की अब यही मेरा घर है.

सब कुछ अच्छा चल रहा था बस कभी कभी मेरी सासू माँ मुझे ताने देतीं की मेरे पापा ने शादी में कुछ नहीं दिया…….. मुझे बहुत बुरा लगता. पर चुपचाप सह लेती, पर धीरे धीरे ताने बढ़ने लगे ……….. मुझे रोज़ सताया जाता और ……और एक दिन मुझे मेरे पिताजी के घर से लाख रूपए लाने को कहा …………. लेकिन अपने “पिता” की आर्थिक हालत जानती थी……… मैं उनसे कुछ कह न सकी …………………. मेरे ससुराल वाले अब मुझे रोज़ मारने पीटने लगे थे …… मेरी सास ननद ससुर ………….. और………. और….. सबसे धोखेबाज वो मेरा पति जिसके हाथों में मेरे पिता ने मेरा हाथ बिना कुछ सोचे समझे ही दे दिया………………… जो अपना पेट भरने के लिए तो दहेज़ के भरोसे बैठा …………. पता नहीं इंजीनियरिंग क्या “दहेज़” मांगने के लिए ही की थी ………… और यदि स्वयं पर भरोसा नहीं था तो शादी ही क्यों की …………! मुझे तो लगता था की ये लड़के पढ़ते ही दहेज़ के लिए हैं………बहरहाल …………. वो मुझे रोज़ सताने लगे ………. मेरी जिंदगी नर्क से भी बढ़कर हो गयी थी ……… ……… मैंने क्या क्या सोचा था अपने जीवनसाथी के वारे में, अपनी ससुराल के वारे में, पर वो सब तो एक नंबर के लालची निकले………………….!

और एक दिन अचानक सबने मिलकर मुझे मारने का षड्यंत्र रचा………………………………….. मरने के बाद तो चिता सभी की जलती है …… उन्होंने तो मुझे जीते जी जला दिया ……………………………… मेरी चीखती रही चिल्लाई ……………….. पर वो मुझे जलता तड़पता देख खुश होते रहे …………… धीरे धीरे मेरी साँसों ने मेरे शरीर का साथ छोड़ दिया …………………

महोदय, मै वाकई पिछले जन्म की यादों को भूलना चाहती हूँ, मै फिर से कन्या रूप में जन्म लेना नहीं चाहती कृपया मेरी मानसिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए मेरे जन्म को स्थगित किया जाए अथवा लड़के रूप में जन्म दिया जाए …………..

एक बार फिर सभी सभासदों के चेहरे को सांप सूंघ गया …………….. एक बार फिर ये सोच नहीं पा रहे थे की क्या किया जाए …………….. चित्रगुप्त बोले….. ” आखिर ये हो क्या रहा है धरती पर ……………… लड़कियों को इतना क्यों पीड़ित किया जा रहा है ……………….. ! क्या किया जाए

मेरे विचार में इस आत्मा को भी लड़के का जन्म दे दिया जाए ………….! एक सभासद ने कहा ………. और सभी ने तुरंत उसकी हाँ में हाँ मिला दी! महाराज चित्रगुप्त ने भी हामी भर दी और अगला प्रार्थना पत्र पढने के लिए कहा, सभासद ने फिर पत्र पढना शुरू किया.

महोदय,

मेरे से ऐसा कौन सा कुसूर हुआ है की मुझे फिर से कन्या का जन्म दिया जा रहा है, मैंने अपने पिछले जन्म में क्या कुछ नहीं सहा या नारी रहते हुए भी क्या नहीं किया जो नारीत्व के विरुद्ध था, और आप फिर से नारी के रूप में भेजकर मेरा जीवन नर्क कर देना चाहते हैं. क्या कुछ नहीं सहा मैंने पूर्व जन्म में …………….. जन्म से ही हमेशा भेदभाव किया जाता था ……………. पहले भाई को खाने को दिया जाता और बाद में मुझे …………….. भाई को अच्छे कपडे मिलते और मै ………. पुराने कपड़ों में ………. मै दिन भर घर के काम में रहती और भाई खेलता रहता ……………… मेरा बचपन चारदीवारी कैद होकर रह गया था ………….. …… भाई अच्छे स्कूल में पढने जाता था और मुझे पास के ही स्कूल में भेज देते …………………… मैं पढ़ना चाहती थी कुछ बनना चाहती थी पर भाई की इच्छाएं हमेशा मेरे आढे आती रहीं, एक अजीब तरह की बंदिशें मेरे ऊपर थीं, ये मत करो वो मत करो …………….यहाँ मत जाओ वहां मत जाओ …………………. लड़कियों को ये नहीं करना चाहिए लड़कियों को वो नहीं करना चाहिए ………………….. और मै लड़की होने के कारण हमेशा दोयम दर्जे का व्यवहार सहती रही ……………. मैं हर दिन इस उम्मीद में निकाल देती की कभी तो पहले मेरी इच्छा भी पूछी जायेगी, ……………. पर वो दिन कभी नहीं आया. धीरे धीरे ये मेरी नियति बन गयी थी, हमेशा एक मानसिक दबाव मेरे ऊपर रहता था……….. ! घर के बाद ससुराल भी ऐसा ही मिला………. वहां भी कभी किसी ने नहीं जानना चाहा की आखिर मैं चाहती क्या हूँ ……… वहां बंदिशें लगी रहीं……………….! धीरे धीरे वो कुंठा घर कर गयी और वैसा ही व्यवहार मैंने अपनी बच्चियों से भी किया ……………. मुझे पता ही नहीं चला की जिस आजादी ………….. जिस समानता ………. के लिए मै जीवन भर तरसती रही…………….. वही गलत व्यवहार मैं अपनी बेटी को दे रही हूँ……………. मै उस जीवन और विचारधारा में इस कदर बांध गयी थी की मैंने अपनी बहु को सताना शुरू कर दिया ……………….और मै कब इतनी क्रूर हो गयी की मैंने ………………………मैंने स्वयं अपनी होने वाली पोती की भ्रूण ह्त्या करवाई………… ! मै कातिल हूँ ……… मै फिर से ऐसी जिंदगी नहीं चाहती …………….

महोदय कृपया कर मुझे फिर से दोयम दर्जे का जीवन न दिया जाये .

मेरी समझ में ये नहीं आ रहा की आखिर नारियों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों हो रहा है …………. कुछ खीजते हुए चित्रगुप्त बोले. औरतें परेशान हैं और कोई कुछ कर क्यों नहीं रहा है ……… और हम लोग भी इसी तरह इन प्रार्थना पत्रों के आधार पर स्त्रियों के स्थान पर पुरुषों को ही जन्म देते रहे तो “लैंगिक अनुपात ” भी गड़बड़ा जाएगा ………………. !

तो क्या इस आत्मा को फिर औरत का ही जन्म देना है …….. एक सभासद ने पूछा
तो क्या करें …………..!

मेरे विचार में जब सबको लड़कों का जन्म दिया है तो इसकी प्रार्थना भी मान लेते हैं ..

ठीक है ………. चित्रगुप्त बोले ………..लेकिन अब और कोई प्रार्थना पत्र नहीं पढ़ा जाए आज मन बहुत विचलित हो गया है इतनी दुखद: कहानियाँ सुनकर …………….!

एक और प्रार्थना पत्र है प्रभु उस पर भी विचार कर लिया जाए .

मन तो नहीं है ………….. पर चलो इसे भी सुन लेते हैं …… पढो

सभासद ने पढना शुरू किया !

महोदय,

मैं पिछले जन्म में नारी थी, मेरे जन्म के साथ ही मेरे परिवार वालों ने मुझे ऐसे रखा जैसे में स्वर्ग की अप्सरा होऊं ………. या परीलोक की कोई परी …. मेरे साथ सब खिलोने की तरह खेलते ……….. ! मैंने बचपन का हर पल खुशियों में जिया मेरे माता – पिता ने मुझे अच्छी शिक्षा दिलाई…………! मेरे सपनो में वो मेरे भागीदार थे उन्होंने हर पल मेरे लिए जिया………………….. उच्च शिक्षा प्राप्त कर मैं विधालय में प्रोफेसर बन गयी ……………. और शिक्षा का प्रसार किया …………….आने वाली नयी पीढी का मार्गदर्शन किया ……………. मैंने ख़ुशी का वो पल भी जिया जिसके बिना एक नारी का जीवन बेकार है……….. मैंने प्रकृति का रूप लिया “जननी” बनी, मातृत्व का सुख भी प्राप्त किया ……………… सचमुच मुझे एक ऐसा परिवार मिला जहां देवता निवास करते थे ……..!
वास्तव में मै अपने पूर्व जन्म की सुखद स्मृतियों को भुला नहीं पायी हूँ …………………… !

मैं पुत्र रूप में जन्म नहीं चाहती …………….. मैं फिर से कन्या का जन्म चाहती हूँ ……… फिर किसी की बेटी, बहन, पत्नी, माँ बनना चाहती हूँ ! मै फिर से एक सुद्रढ़ परिवार, समाज, राष्ट्र की नीवं रखना चाहती हूँ ………. ! मैं फिर से प्रकृति का रूप चाहती हूँ ………… मैं माँ बनना चाहती ……….. बेटी बनना चाहती हूँ…………….

महोदय में लड़के का जन्म नहीं चाहती ………………..

पत्र को सुनने के बाद सब एक दुसरे का मुहं देखने लगे …………………….. सभी हतप्रभ थे …फिर चित्रगुप्त ने खड़े होकर धीरे धीरे ताली बजानी शुरू की ………सभी तालियाँ बजाने लगे ………… चित्रगुप्त के चेहरे पर ख़ुशी के आंसू थे …………….. वो बोले : “धरती पर अभी भी इंसानियत है !” और ये भी प्रार्थना स्वीकार कर ली ………………….!



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
February 19, 2015

मुनीश जी यह बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है .सच है लड़की का जन्म कष्टों से भरा होता है पर इस कारण की समाज की सोच उसे जीने नहीं देती पर उसकी शक्ति असीम है वह अपना संसार सुखद बना सकती है बस उसे पुरुष की अच्छी सोच का भी साथ चाहिए मोहम्मद जिन्ना ने भी कहा था ” दुनिया में दो प्रकार की ताकतें हैं एक तलवार और दूसरी कलम की इन दोनों से भी ज्यादा बड़े ताकत है-महिला की शक्ति अंतिम भाग सुन्दर पर प्रत्येक नारी बहुत संघर्ष झेलती है महत्वपूर्ण यह की सब सह कर भी समाज को सुन्दर बनाने का प्रयत्न जारी रखती है. एक सुन्दर से ब्लॉग पढ़ कर बहुत अच्छा लगा साभार

jlsingh के द्वारा
January 25, 2015

प्रणाम महोदय, कारुणिक पर सुखद अंत यानी सुखांत …एक रचनाकार को आशावादी होना ही चाहिए वैसे इस शीर्षक को देखकर रात से ही पढने का प्रयास कर रहा था ..रात में नहीं खुला, शायद तकनीकी गड़बड़ी या रात में मुझे कष्ट नहीं देना चाहते थे, चित्रगुप्त महोदय ..शुबह शुबह पढ़ पाया …काफी दिनों बाद आपकी उपस्थिति से रोमांचित हूँ …विषय बड़ा ही सामायिक और ऑंखें खोलनेवाला है. सादर मुनीश बाबू …अपनी उपस्थिति बनाये रक्खें


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