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हमारे बुजुर्ग और समाज - समस्याएं और निदान

Posted On: 16 Jun, 2014 Others,social issues में

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“किस्मतवाले होते हैं वो लोग जिनके सिर पर बुजुर्गों का हाथ होता है” कुछ ऐसा ही कहा जाता है हमारे समाज में बुजुर्गों के सम्मान के लिए और ऐसा ही बहुत सा साहित्य भी मौजूद है। सत्संग, सामाजिक कार्यक्रमों आदि में भी कुछ इसी तरह के उपदेश श्रोताओं को सुनाये जाते हैं। लेकिन फिर भी समाज की वस्तुस्थिति बहुत ज्यादा सकारात्मक नहीं है बल्कि कहिये की नकारात्मक ही है।


आज हमारे समाज में हमारे ही बुजुर्ग एकाकी रहने को विवश हैं उनके साथ उनके अपने बच्चे नहीं हैं। गावों में तो स्थिति फिर भी थोड़ी ठीक है लेकिन शहरों में तो स्थिति बिलकुल भी विपरीत है। ज्यादातर बुजुर्ग घर में अकेले ही रहते हैं, और जिनके बच्चे उनके साथ हैं वो भी अपने अपने कामों में इस हद तक व्यस्त हैं की उनकेपास अपने माता – पिता से बात करने के लिए समय ही नहीं है।


ऐसी स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है या क्या कारण हैं इस विवाद से मैं बचना चाहता हूँ, क्योंकि हर पीढ़ी के पास अपने ज़वाब हैं अपने तर्क हैं जो हर परिवार और व्यक्ति के लिए अलग अलग हैं और सही भी हो सकते हैं।

ये भी सच है की आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति अपने लिए ही दो पल नहीं निकाल पाता है तो फिर अन्य जिम्मेदारियां कैसे पूरी करे। और यही सोच उसके व्यहवहार और विचारों में शुष्कता लाती है जिसके कारण परिवार में और खासतौर से उसके माता – पिता से दूरियां बढ़तीं हैं। कुछ विशेष कारण न होते हुए भी दोनों पीढ़ियों के बीच एक अद्रश्य दीवार सी खड़ी हो जाती है दोनों एक छत के नीचे रहते हैं प्रतिदिन एक दुसरे को देखते भी हैं मिलते भी हैं लेकिन फिर भी एक दुसरे से अपने विचारों का आदान प्रदान नहीं कर पाते और मैं इसको सकारात्मक दृष्टि से देखूं तो कहूँगा की चाहकर भी प्रयाप्त समय नहीं दे पाते।

उन परिवारों की स्थिति भी विकट है जिनके माता पिता और बच्चे अलग अलग शहरों में जीविका के कारण रह रहे हैं ऐसी स्थिति में बच्चे अपने माता पिता का पूरा ध्यान नहीं रख पाते और माता पिता अकेले ही जीवन गुजार देते हैं।

लेकिन ऐसी स्थितियां कहीं भी ये सिद्ध नहीं करतीं हैं की किसी बुजुर्ग का अपमान हुआ हो या बच्चों ने कोई अत्याचार किया हो।

लेकिन कुछ परिवार ऐसे भी हैं जहां वास्तव में बुजुर्गों की अवहेलना की जाती है अपमान किया जाता है। उनको तिरस्कृत किया जाता है। मैं फिर यही कहूँगा की हर परिवार की स्थिति भिन्न हो सकती है इसलिए किसी भी पीड़ी को दोष देना कठिन है।

उदाहरणार्थ मेरे एक जानकार हैं बचपन से मैं उनको जानता हूँ उसकी “माता जी” उसकी दादी से आदरपूर्ण व्यवहार नहीं करतीं थीं और बात बात पर तिरस्कृत भी करतीं। अब वो बुजुर्ग हो गयीं हैं और उनको भी उनके पुत्र के द्वारा वैसा ही व्यवहार भोगना पड़ रहा है जैसा की वो स्वयं करतीं थीं। आप में से बहुत विद्द्जन उस लड़के को उपदेश दे सकते हैं की ये मानवता नहीं है की यदि किसी ने कुछ गलत किया है तो उसके साथ भी गलत व्यवहार हो। लेकिन उस बच्चे ने जो बचपन से देखा – सीखा वही तो वो दोहराएगा। और ये तो गीता भी कहती है की कर्मों का फल अवश्य मिलता है जैसे कर्म वैसा फल।

बहरहाल में इस उदाहरण से ये सिद्ध नहीं करना चाहता की पुरानी पीढ़ियों ने कुछ गलत किया बल्कि ये कहना चाहता हूँ की समाज के नैतिक मूल्यों में धीरे धीरे गिरावट आई है और वो अपने घर से नहीं तो समाज में अन्य कहीं से। लेकिन गिरावट है।

अब एक तीसरी स्थिति ये है की जब दूसरी स्थिति वाले बुजुर्ग जो वाकई में प्रताड़ित हैं पहली स्थिति वाले बुजुर्गों से मिलते हैं (जो की वास्तव में उपेक्षित नहीं हैं केवल समयाभाव या गलत समय प्रबंधन के कारण अपने बच्चों के साथ प्रयाप्त समय नहीं बिता पाते हैं ) और विचारों का अपनी स्थिति का आदान प्रदान करते हैं और जब पहली स्थिति वाले बुजुर्ग दूसरी स्थिति वाले बुजुर्गों की व्यथा सुनते हैं तो वातावरण में एक नकारात्मकता का भाव उत्पन्न होता है जो सारे समाज और विशेषकर बुजुर्गों के विचारों में संशय की स्थिति उत्पन्न करता है। अर्थात यदि बुजुर्गों की समाज में स्थिति यदि दस प्रतिशत वास्तविक है तो नब्बे प्रतिशत केवल नकारात्मक वातावरण के कारण है हो सकता प्रतिशतता के आंकड़े में मैं गलत होऊं लेकिन मेरे विचार में वस्तुस्थिति शायद कुछ ऐसी ही है।

इसका निदान सभी लोग अपने अपने अनुसार ढूंढ रहे हैं और आजकल वृद्धाश्रमों का भी बोलबाला है कुछ वृद्ध इसको मजबूरी बताते हैं तो कुछ हेय दृष्टि से भी देखते हैं। मेरी व्यक्तिगत सोच कभी भी इस तरह के आश्रमों के पक्ष में नहीं रही। मैं तो यही चाहता हूँ की घर में बुजुर्गों का साथ हमेशा बना रहे।

लेकिन जब भारत के इतिहास पर नजर डालता हूँ तो पाता हूँ की हमारे पूर्वजों ने जीवन के अंत समय में जब व्यक्ति के दायित्वों की पूर्ती हो जाती थी “वानप्रस्थ” की व्यवथा दी थी शायद ये वृद्धाश्रम वानप्रस्थ का आधुनिक रूप हों।

लेकिन वास्तव में मेरे विचार में हमारे बुजुर्गों को भी प्रेरणा की आवश्यकता है जीवन के इस पड़ाव पर भी वो अनुकरणीय उदाहरण दे सकते हैं और वैसे भी हम सदा से अपने बुजुर्गों से ही सीखते आये हैं वो अपने जीवन भर के अनुभव की पूँजी से समाज को सार्थक दिशा से सकते हैं जिनकी जिमींदारियां पूर्ण हो चुकी हैं वो उन लोगों की शिक्षा, विवाह, या स्वास्थ्य आदि में सहायक हो सकते हैं जो आज भी इन सब के लिए मोहताज हैं उदाहरण स्वरुप आजकल ज्यादातर घरों में झाड़ू-पोंछा, चौका-बर्तन वाली लगीं हुईं हैं अगर हमारे बुजुर्ग उनके बच्चों को ही एक घंटे पढ़ाएं या पढ़ने में या अन्य कामों में आर्थिक या कोई अन्य मदद कर दें तो समाज की दिशा दशा भी सुधरेगी और उनका एकाकीपन भी दूर होगा।

युवाओं को भी समय प्रबंधन थोड़ा ठीक करना होगा और अपने बुजुर्गों को सम्मान देना होगा आखिर वो आज जो कुछ भी हैं अपने बुजुर्गों के कारण ही हैं। साथ ही बुजुर्गों को भी आज की समय और परिस्थितियों को देखते हुए बच्चों के विषय में सकारात्मक रुख अपनाना होगा। अंत में मैं यही कहूँगा की हमें एक स्वस्थ और मजबूत समाज की रचना के लिए अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शन और युवाओं के जोश की आवश्यकता है न की एक दुसरे को तिरस्कृत कर टूटे हुए समाज की !



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jyoti dehliwal के द्वारा
June 26, 2014

बुजुर्गो का अनुभव और युवा जोश का सही समन्वय ही आज की आवश्यकता है. मुनीश जी बेहतरीन लेख .आभार !

yogi sarswat के द्वारा
June 25, 2014

बहुत से कारण हैं मुनीश जी ! आर्थिक स्थिति , सामाजिक परिवेश और अपना लाइफ स्टाइल ! आपको आखिर वाला कारण कुछ अजीब लगेगा ! लेकिन ऐसा है , कुछ लोग सब तरह से समर्थ होते हुए भी अपने माँ बाप को अपने पास नहीं रखना चाहते क्यूंकि उनकी चमड़ी सिकुड़ चुकी होती है , चमकीली नहीं होती , उसमें झुर्रियां आ जाती हैं ! जो उनके पास आने वाले मिलने वालों पर बेड इफ़ेक्ट डालती हैं ! मैं नहीं कह रहा ये बात , लेकिन ऐसा है ! बहुत से कारण और निदान बताये हैं आपने ! सच में ही पुरस्कृत होने लायक पोस्ट हैं आपकी ! साधुवाद

Ravinder kumar के द्वारा
June 23, 2014

मुनीश जी, मेरे पिता जी अक्सर कहते हैं के, साथ रहना है तो गम खाना पड़ता है. अर्थात संयम रखना पड़ता है. अगर हमारे युवा ये समझ लें तो बहुत सी समस्याएं हल हो सकती हैं. जो बुजुर्ग पूरा जीवन अपनी संतानों के लिए समर्पित कर देते हैं तो उन्हें हक़ है के वो अपने बच्चों से कुछ अपेक्षाएं रखें. अगर वो कुछ कह भी देते हैं तो बच्चों का कर्त्वय है के संयम रखें और उन्हें समझें . मुनीश जी बेहतरीन लेख, आपको बधाई. कभी हमारी तरफ भी आइये. आपका स्वागत है.

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 22, 2014

मनीस जी मुद्दा बहुत उत्तम है किन्तु हल कुछ भी नहीं हमारे धर्म ग्रंथों मैं ,ज्योतिष मैं सब पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होता है यह उपदेश से या धर्म भय से भी नहीं सुधरता मनुष्य की प्रकृति भी उनके सुख दुःख को साकार करती है बहुत अधिक सीधे ,या बहुत अधिक कूटनीतिज्ञ की दुर्गती ही होती है ब्रद्धावस्था  स्वयं ही एक शाप है भगवान बुद्ध भी बहुत दुखी हुए थे बस एक ही रास्रता है ओम शांति शांति शांति जपते अंत से संतोष रखो 

June 21, 2014

बहुत अच्छी bat kahi है मुनीश जी .vaise hamare buzurg bhi kisi की sunte thode hi हैं ve apni zavani ke din bahut jaldi bhool जाते हैं और आज की पीढ़ी शायद यही सोचती है की हम तो हमेशा जवान रहेंगे .सार्थक पोस्ट .आभार

rajanidurgesh के द्वारा
June 21, 2014

आपने बहुत ही उपयुक्त मुद्दा उठाया है अत्यंत ही गंभीर समस्या है बुजुर्ग और आज की पीढ़ी दोनों अपनी जगह सही है कुछ लोगो को छोड़कर सभी विवश हैं बधाई मुणेशजी

    munish के द्वारा
    June 24, 2014

    आदरणीय रजनी जी कमेंट के लिए धन्यवाद , साथ ही ये भी कहूँगा की विवशता का नाम लेकर समस्या से भागा नहीं जा सकता, कुछ न कुछ तो सकारात्मक प्रयास करना ही होगा

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
June 20, 2014

मुनीश जी बधाई । महत्वपूर्ण विषय पर अच्छा लेख है । 

    munish के द्वारा
    June 21, 2014

    धन्यवाद बिष्ट जी

vandanasingh के द्वारा
June 20, 2014

“अब एक तीसरी स्थिति ये है की जब दूसरी स्थिति वाले बुजुर्ग जो वाकई में प्रताड़ित हैं पहली स्थिति वाले बुजुर्गों से मिलते हैं (जो की वास्तव में उपेक्षित नहीं हैं केवल समयाभाव या गलत समय प्रबंधन के कारण अपने बच्चों के साथ प्रयाप्त समय नहीं बिता पाते हैं ) और विचारों का अपनी स्थिति का आदान प्रदान करते हैं और जब पहली स्थिति वाले बुजुर्ग दूसरी स्थिति वाले बुजुर्गों की व्यथा सुनते हैं तो वातावरण में एक नकारात्मकता का भाव उत्पन्न होता है जो सारे समाज और विशेषकर बुजुर्गों के विचारों में संशय की स्थिति उत्पन्न करता है। अर्थात यदि बुजुर्गों की समाज में स्थिति यदि दस प्रतिशत वास्तविक है तो नब्बे प्रतिशत केवल नकारात्मक वातावरण के कारण है हो सकता प्रतिशतता के आंकड़े में मैं गलत होऊं लेकिन मेरे विचार में वस्तुस्थिति शायद कुछ ऐसी ही है।” आपकी सोच सार्थक और विचारणीय है , सिक्के के हर पहलू को देखना चाहिए. साप्ताहिक सम्मान की बधाई

    munish के द्वारा
    June 21, 2014

    आदरणीय वंदनाजी कमेंट के लिए धन्यवाद . ये तो सच ही है की सिक्के के दो पहलू होते हैं परन्तु हम ज्यादा गौर से उधर ही देखते हैं जिस तरफ उसका मूल्य अंकित है अर्थात स्वार्थ जहां ज्यादा है यदि थोड़ा निस्वार्थ होकर दूसरी तरफ भी देखें तो सामान्य ज्ञान तो बढ़ ही सकता है और कुछ विचार करने का मौका भी धन्यवाद आपका

jlsingh के द्वारा
June 20, 2014

साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई! सुन्दर सन्देश देती हुई रचना! कृपया लिखते रहें आपके सभी आलेख मैं पढता हूँ…

    munish के द्वारा
    June 21, 2014

    आपका आशीर्वाद और स्नेह हमेशा बना रहे बस यही कामना है

sadguruji के द्वारा
June 19, 2014

सार्थक और विचारणीय लेख ! आपको बहुत बहुत बधाई ! बेस्ट ब्लोगर आफ दी वीक चुने जाने की भी बधाई !

    munish के द्वारा
    June 21, 2014

    शुक्रिया गुरूजी

jlsingh के द्वारा
June 17, 2014

युवाओं को भी समय प्रबंधन थोड़ा ठीक करना होगा और अपने बुजुर्गों को सम्मान देना होगा आखिर वो आज जो कुछ भी हैं अपने बुजुर्गों के कारण ही हैं। साथ ही बुजुर्गों को भी आज की समय और परिस्थितियों को देखते हुए बच्चों के विषय में सकारात्मक रुख अपनाना होगा। अंत में मैं यही कहूँगा की हमें एक स्वस्थ और मजबूत समाज की रचना के लिए अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शन और युवाओं के जोश की आवश्यकता है न की एक दुसरे को तिरस्कृत कर टूटे हुए समाज की ! आदरणीय मुनीश बाबू, सादर अभिवादन! आपके विचार संतुलित और सधे हुए हैं…. मेरा अनुभव यह बतलाता है आज बुजुर्गों की बात सुनने वाला कोई नहीं है … समय का अभाव कहें या या नया चाव …पुरानी चीजों से हम दूर ही भागते हैं …मेरे पिताजी, किसान थे, दिन भर खेत में काम करने के बाद रात में लालटेन के प्रकाश में रामायण पढ़कर गांव के लोगों को सुनाते समझाते थे. … तब लोग सुनते थे चाव से …अब कौन सुनेगा ..जहाँ रामलीला फिल्मों और टी वी चैनलों पर दिखलाई जाती है ज्यादा रोचक तरीके से. फिर भी समाधान और सामंजस्य जरूरी है…सादर! .

    munish के द्वारा
    June 21, 2014

    आदरणीय सिंह साहब सादर अभिवादन , कारण तो यही है की अब बुजुर्गों की कोई नहीं सुनता लेकिन क्यों ? इस पहलु पर भी फिर से विचार करने की आवश्यकता है मेरे विचार में बहुत काम लोग ही ऐसे होंगे जो वास्तव में अपने बजुर्गों और माता पिता को महत्त्व न देते हों . फिर भी ये समस्या है और इसका निराकरण भी जरूरी है


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