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तो क्या ये लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

Posted On: 27 May, 2013 Others में

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हमें आजाद हुए पैंसठ साल हो गए। और पैंसठ साल में पहली बार लोकतंत्र पर हमला होता है नक्सलियों द्वारा, ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ जब लोकतंत्र पर हमला हुआ हो। यदि हुआ भी होगा तो किसी नेता को ऐसा नहीं लगा होगा की पक्ष विपक्ष एक सुर में लोकतंत्र पर हमले का एक सा राग गायें।

जब नेता मरते हैं तो लोकतंत्र पर हमला होता है लेकिन जब लोकतंत्र का लोक अपने चुने हुए तंत्र से अपने लिए बेसिक सुविधाएं मांगता है और उसे पैंसठ साल बाद भी कुछ नहीं मिलता तो क्या लोक पर तंत्र का हमला नहीं होता है ?

जब पैंसठ साल बाद भी पूंजीवादी व्यवस्था इस कदर हावी हो की अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है लोग गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं तो क्या ये लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

जहाँ अनाज गोदामों में सड़ रहा हो और लोग भूखे मर रहे हों, सड़े हुए आनाज को भी पूंजीपति अपने फायदे के लिए इस्तमाल करते हों, और उच्चतम न्यायालय के मुफ्त अनाज देने की सलाह पर ये हमारा तंत्र मजबूरी जताता है, तो क्या ये लोक पर तंत्र का हमला नहीं है?

जहां पैंसठ साल बाद भी इस तंत्र का लोक अपनी सुरक्षा को लेकर बेचैन हो, जहां रात को सोते समय माँ अपने रोते बच्चे से कहे “चुप हो जा वर्ना पुलिस को दे दूँगी” और बालक पुलिस के दर से चुप हो जाए, तो क्या ये तंत्र का लोक पर हमला नहीं है ?

जब लाखों करोड़ों रूपए के घोटाले होते हों और सरकार घोटालेबाजों का समर्थन करे तो क्या लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

लोकतंत्र के मंदिर में इस तंत्र को खरीदा बेचा जाता हो नोट लहराए जाते हों तो क्या ये इस लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

सोते हुए लोगों पर लाठी चार्ज होता है हर रोज़ बलात्कार होता है और पूरा तंत्र खामोश रहता है तो क्या ये इस लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

इस देश के सैनिकों के सर पडोसी देश के सैनिक काट ले जाते हैं चीन हमारी जमीन में घुसकर हमें धमकता है और हमारी सरकार के मुहं से एक शब्द नहीं फूटता तो क्या ये इस लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

जब सरकार स्वयम क्षेत्रवाद को बढ़ावा देती हो आरक्षण के बहाने जातिवाद को बढ़ावा देती हो जहां सरकार स्वयं दो धर्मों में भेद करती हो और सामान नागरिकता का विरोध करती हो तो क्या ये इस लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

हर साल कौमी दंगे, धर्म विशेष के नाम पर आतंकवादीयों का समर्थन तो क्या ये इस लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

जब देश में अपने स्वार्थ के लिए इमरजेंसी लगा दी जाती हो निपराध लोगों को जेलों में दाल दिया जाता हो लोगों की जुबान बंद की जाती है तो क्या ये इस लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

मैं किसी भी सूरत में नक्सली हिंसा को जायज नहीं ठहराता लेकिन इस सबकी जिम्मेदार कौन है जो जानबूझकर इन सब घटनाओं को होने देती है अपनी आँख मूँद लेती, अपने मुल्क से ज्यादा विदेशी व्यापारियों की चिंता करती है, अपने नागरिकों को विदेशों में मरने के लिए छोड़ देती है, ऐसी सरकार यदि इस लोकतंत्र के लिए गौरव की बात हो तो हो परन्तु उसे ये कहने का अधिकार नहीं है की “ये लोकतंत्र पर हमला” है क्योंकि इस तरह के हमलों की नींव तो स्वयं सरकार ही अपनी भेदभावपूर्ण नीतियों, क्षेत्रवाद को बढ़ावा देते फैंसलों, धर्म के आधार पर समाज को बांटकर करती है। जिस देश के नेता दंगों का समर्थन ये कहकर करते हों की ” जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती ही है उस देश के नेताओं ऐसी आतंकवादी घटनाओं पर ये कहने का अधिकार नहीं है की “ये लोकतंत्र पर हमला है”

किसी भी सूरत में नक्सलवादियों की हरकत एक जघन्यतम अपराध है परन्तु नक्सलवाद को सरकार ने समय रहते क्यों नहीं समझने की कोशिश की उनके साथ क्यों वार्तालाप नहीं किया गया। क्यों उनकी समस्याओं को नहीं समझा गया क्यों उनको मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास नहीं किये गए। यदि समय रहते समस्या का निदान नहीं किया जाता तो विस्फोट होता ही है और जब जब समस्या को अनदेखा या गलत तरीके से सुलझाने की कोशिश की गयी तो परिणाम हिंसक और विभत्स रूप में ही सामने आया जैसे देश का बंटवारा, हिंसा ही हिंसा और बाद में गांधी वध, पंजाब में आतंकवाद और इंदिरा जी की हत्या, तमिल समस्या और राजीव गांधी हत्या काण्ड, इतिहास भी ऐसी घटनाओं से अछूता नहीं है दुर्योधन की महत्वाकांक्षा और महाभारत, आदि आदि।

इसलिए यदि कोई ये कहता है की ये लोकतंत्र पर हमला है तो गलत है क्योंकि लोकतंत्र पर हमला करने वाले कहीं बाहर से नहीं आये वो इसी देश के निवासी हैं यदि हथियार इस तंत्र के विरोध में बच्चे, बूढ़े, जवान और औरतों ने भी उठाये हैं यदि उनकी संख्या हजारों लाखों या पूरे क्षेत्र में फैली है तो निश्चित ही पूरे समुदाय को आतंकवादी कहकर समस्या से भागा नहीं जा सकता। उसका निराकरण करना ही होगा। बातचीत के जरिये और उनमें इतना विशवास जगाना होगा की भारत सरकार उनके खिलाफ नहीं उनके साथ है उनकी पीडाओं को समझती है। जब तक ये भावना उनके बीच नहीं जायेगी उनके लिए मूलभूत सुविधायें नहीं पहुंचाई जायेंगी उन्हें मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जाएगा जब तक उन्हें ये अहसास नहीं कराया जाएगा की वो भी इस लोकतंत्र का हिस्सा हैं तब तक ये कहना की ये लोकतंत्र पर हमला है गलत होगा। सरकार को इस विषय में भी सिरे से सोचना होगा की आगे ऐसी घटनायें न हों। ये घटनाक्रम निंदनीय था उसकी निंदा होनी चाहिए परन्तु सरकार को उन समस्याओं का भी निराकरण करना चाहिए जो ऐसी समस्याओं के मूल में हैं



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

May 30, 2013

हाँ……………………….हाँ……………………….मूर्खों का राज्य ……..मूर्खों द्वारा ………….मूर्खों के साथ……………..मूर्खों के लिए…………………!

    munish के द्वारा
    June 3, 2013

    आदरणीय अनिल जी अपने कमेंट पर दोबारा विचार कीजिये. शायद आप कुछ और कहना चाह रहे हों या मैं पूरी तरह न समझ पाया हूँ की आप क्या कहना चाहते हैं

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 29, 2013

saarthk lekh aadrniy munish ji sasneh badhai

    munish के द्वारा
    June 3, 2013

    शुक्रिया सर

yogi sarswat के द्वारा
May 29, 2013

वो वहां बैठे हैं जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है , और वहां जाकर कोई भी चोर -डाकू -लूटेरा -हत्यारा -बलात्कारी सबके सब पवित्र हो जाते हैं ! तब आपको कैसे लगता है की उनकी मौत कहर न बरपाएगी ? आखिर वो प्रतिनिधि हैं हमारे और आपके ! उन्हें ये अधिकार है की वो अपने लिए कानून अपने हिसाब से बनाएं , अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जियें ! अगर उन्हें भी हम जैसा रहना होता तो फिर नेता ही क्यूँ बने ? तो श्री मुनीश जी , हमने लोकतंत्र को जैसा पढ़ा है वैसी उम्मीद हिंदुस्तान में मत करिए ! लिखने और कहने की जरुरत नहीं की बेहतरीन पोस्ट पढ़ रहा हूँ !

    munish के द्वारा
    June 3, 2013

    आदरणीय योगी जी उम्मीद पर दुनिया कायम है इसलिए कम से कम सही गलत तो कहना ही चाहिए. और आज जरूरत इस लोकतंत्र में आवाज उठाने वालों की ही है. शुक्रिया प्रोत्साहन के लिए

jlsingh के द्वारा
May 27, 2013

आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! आपकी सारी बातें तर्कसंगत है …निदान ढूँढा जाना चाहिए, बात चीत से या विकास का मार्ग खोलकर सबको सामान सुविधा मुहैया कराकर! आज भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी सुविधाओं की घोर कमी है, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी है. निश्चित ही इन पर सभी राजनीतिक दल को एक मत होकर समाधान के रस्ते ढूंढें जाने चाहिए. आईपीएल और अन्य जश्नों में पानी की तरह पैसा बहाया जाता है …जबकि दूसरी जगहों में पीने का पानी भी नहीं मुहैया कराई जाती तो विष्फोट तो होना ही था. पर नक्सली का इस प्रकार का या उस प्रकार का खूनी खेल किसी भी तरीके से जायज नहीं कहा जा सकता! …..आप भी इस बात को मान रहे हैं. केवल लोकतंत्र पर हमले वाले जुमले से आप नाराज हैं. ऐसा प्रतीत होता है! सादर!

    munish के द्वारा
    May 28, 2013

    आदरणीय सिंह साहब किसी भी समस्या का समाधान हिंसा नहीं हो सकता लेकिन अहिंसा के सिद्धांत को समझाने के लिए हिंसा भी जरूरी है जैसे भगत सिंह ने संसद में बम फोड़कर की थी, ये जरूरी भी है क्योंकि सत्ता आज भी अंधे गूंगे बहरे लोगों के हाथ में ही है जो न किसी कष्ट देखना चाहते हैं न सुनना चाहते हैं और न ही उस पर कुछ बोलना चाहते हैं. लेकिन बात ये है की जब नेता मरे तो लोकतंत्र पर हमला और प्रधानमन्त्री, सोनिया गांधी, राहुल गांधी सब के सब देखने चल दिए हॉस्पिटल में और अभी जब डेढ़ दो साल पहले इन्ही नक्सलियों ने ७५ सीआरपीऍफ़ के जवानों को मार दिया था तब तो कोई लोकतंत्र पर हमला नहीं हुआ न ही प्रधानमन्त्री को इतनी फुर्सत मिली को वो घायलों से मिल भी लेते. अब करैं न मृतकों के परिवार वालों को दो दो लाख, और घायलों के परिवार वालों को पचास पचास हज़ार देकर मामले को रफा दफा ……..


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