JANMANCH

तथ्य कई हैं पर सत्य एक है.

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जीवन की नैया राम के सहारे

Posted On: 20 May, 2013 Others में

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मिट्ठनलाल जी आज सुबह सुबह ही घर आ गए। मैंने अभिवादन कर उनको बैठने के लिए कहा तो उन्होंने मुझे गले से लगाते हुए बोले ” कल से दिल बड़ा बेचैन था तुम से मिलने के लिए तुम दोनों भाई मुझे राम लक्ष्मण जैसे लगते हो। वो मेरे छोटे भाई से भी उतनी ही आत्मीयता से मिले जैसे मुझसे मिले थे। मिट्ठन लाल जी की उम्र लगभग सत्तर वर्ष की रही होगी। वो अक्सर हम से मिलने आते थे। उनसे मुलाक़ात एक बार सुबह सुबह पार्क में हो गयी थी वो व्यायाम कर रहे थे और में भी हाथों को हिल रहा था ये देखकर की मैं कुछ सुस्ती से व्यायाम कर रहा हूँ उन्होंने मेरे को जोश दिलाया जैसे जाम्बवंत जी ने हनुमान जी को दिलाया था। और थोडा ढंग से व्यायाम करा दिया फिर हम अक्सर मिलने लगे हालांकि मेरी और उनकी उम्र में और मेरी उम्र लगभग पचास वर्ष का अंतर था लेकिन फिर भी मुझे उनकी बातें अच्छी लगती थीं और उनका साथ पसंद था। उस दिन वो मेरे लिए एक पेन लेकर आये थे उनको भी शायद किसी ने उपहार स्वरुप ही दिया था।


वो अक्सर मुझे बताते की उनके तीन बेटे हैं एक डिग्री कॉलेज में प्रोफ़ेसर है दूसरा चार्टर्ड अकाउंटेंट है और तीसरा इंजिनियर तीनों की इनकम भगवान् की दया से बहुत अच्छी है। वैसे उनकी आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही वो एक प्राइवेट फर्म में सेल्समैन का काम करते थे और बड़ी म्हणत करके उन्होंने अपने बेटों को इस मुकाम तक पहुंचाया था उनका एक पोता तो मर्चेंट नेवी में भी था भरा पूरा परिवार वो मुझे अक्सर अपने परिवार के विषय में बताते।


एक बार मुझे उनके घर जाने का सौभाग्य मिला। वैसे क्या सौभाग्य लिखना ठीक होगा ये कुछ कठिन है बतलाना, मिट्ठन लाल जी की पत्नी का स्वास्थय थोडा खराब हो गया और वो कुछ दिन तक नहीं मिले तो मैंने सोचा की चलकर देखा जाए की ” बाबू जी कहाँ रह गए ” मैं उनको “बाबूजी” कहकर ही संबोधित करता था। घर पहुंचकर जो मैंने देखा वो सहसा विशवास सा नहीं हुआ। मिट्ठन लाल जी एक कमरे के मकान में किराए पर रहते थे कमरे में कुछ ख़ास सामान नहीं था कुछ कनस्तर एक संदूक एक छोटा सा ब्रीफकेस और एक पलंग एक मेज दो कुर्सी ……… एक चटाई भी जमीन पर पड़ी थी उनकी पत्नी बैड पर लेटीं थीं वो बराबर में कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। मेरे को देखकर वो उसी आत्मीयता से मिले जिस तरह से वो रोज़ मिलते थे। मैंने अम्मा जी के स्वास्थ्य के विषय में जानकारी ली। तो पता चला की गुर्दों में कुछ समस्या है शायद ओपरेशन कराना पड़े वो कुछ चिन्तित थे। मैंने पुछा की घर के बाकी लोग कहाँ हैं। तब मुझे पता चला की दो बेटे तो उसी शहर में अपना मकान बना कर अलग रह रहे हैं और इंजिनियर की जॉब किसी अन्य शहर में है वो कहीं दूर रहता है। लेकिन बाबूजी के बिना कुछ कहे ही में समझ गया की तीनों ही बेटे अपने माता पिता को साथ नहीं रखना चाहते ……..! उनकी जीविका आज भी कुछ छोटा मोटा माल बेच कर उसके कमीशन से ही चलती है वो पेन भी उन्हें कहीं से कमीशन में ही मिला था


बहरहाल मिलना जुलना होता रहा मैं पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गया। लेकिन जब भी घर जाता तो मैं “बाबूजी” से मिलने जरूर जाता एक बार पता चला की बाबूजी की धर्म पत्नी बिमारी की अवस्था में ही चल बसीं। सुन कर दुःख हुआ और मैं उनसे मिलने गया। वो मेरे से वैसे ही गले मिले जैसे हमेशा मिलते थे और बोले तुम तो मेरे राम हो। मुझे उनका ये वाक्य हमेशा से अच्छा लगता था उस दिन भी अच्छा लगा पर न जाने क्यों इस बार मैं पहली बार उनके प्रति सचमुच भावुक था। मुझे उन्होंने बताया की कैसे अम्मा जी बिमारी की अवस्था में सेवा के अभाव में चल बसीं साथ ही उन्होंने अपने बच्चों की तारीफ़ भी की ” कि कैसे अम्मा जी के स्वर्गवास की खबर सुनते ही वो लोग दौड़े चले आये। बच्चे बड़े ही अच्छे हैं माँ की सुनते ही आ गए उन्होंने फिर अपने बेटों की तारीफ़ मुझसे की। मैंने उनसे पुछा की क्या अब वो अपने बेटों के साथ चले जायेंगे। तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया की मेरा मन यहीं पर लगता है। मुझे सुनकर कुछ अजीब लगा। लेकिन मैं वापस दिल्ली आ गया।


यहाँ दिल्ली में जहां मैं रहता था वहीँ बराबर में किराए पर ही एक पति पत्नी रहते थे उनके एक छोटा बच्चा भी था तकरीबन चार साल का, देखते ही देखते उस बच्चे की मुझसे दोस्ती हो गयी वो मेरे पास आ जाया करता था। और मैं भी अक्सर अपना टाइम पास उसके माध्यम से करता उस समय मेरी ख़ास जान पहचान वहां नहीं थी इसलिए मैं खाली समय में या तो उस बच्चे के साथ खेलता या घूमने निकल जाता। कुछ दिनों बाद उस बच्चे ने मेरे पास आना कम कर दिया तो पता चला उसके स्कूल गए हैं और वो अब मुझसे ज्यादा बिजी हो गया है। बहरहाल दिन बीतते रहे वो बच्चा कभी कभी मेरे पास आता लेकिन अब उसका चेहरा पीला पद गया था चेहरे पर उदासी लगी थी मुझे देखकर बहुत खुश होता आने के बाद जाना ही नहीं चाहता लेकिन थोड़ी देर में ही उसकी मम्मी की आवाज आ जाती और वो उदास मन से चला जाता। एक बार मैं मकान मालिक के पैसे देने सुबह सुबह उनके घर गया तो देखा वो बच्चा उनके घर बैठा हुआ था स्कूल के लिए तैयार मैंने उस से पूछा ” अरे वाह स्कूल जा रहे हो “


उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने उस से फिर पुछा ” तुम यहाँ क्या कर रहे हो तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं ” जवाब उसकी जगह मकान मालिक ने दिया ” क्या बताएं बेचारा इसी तरह उदास रहता है” मैंने पुछा ” क्यों?


वो बोले इसके मम्मी और पापा दोनों ही जॉब पर जाते हैं इसकी स्कूल बस इसकी मम्मी के जाने के आधे घंटे बाद आती है तो इसे तैयार करके हमारे यहाँ बिठा जाते हैं। जब बस आती है तो इसको हम बिठा देते हैं ऐसे ही जब ये स्कूल से आता है तो हम उतार कर बैठा लेते हैं। इसकी मम्मी एक घंटे बाद आती है फिर ये उनके साथ अपने घर चला जाता है या कभी कभी हमसे कहता है तो हम घर खोल देते हैं क्योंकि चाबी इसकी मम्मी हमें ही दे जाती है। ये जाकर घर मैं बैठ जाता है या लेता रहता है , अरे क्या बताएं बड़ा ही गोलू मोलू सा था अब देखो कैसा सिकिया पहलवान हो गया है चिढ़चिढ़ाता है वो अलग। वैसे तो दोनों बहुत ख़याल रखते हैं इसका सब कुछ लाते हैं पर न जाने इसको क्या होता जा रहा है। मैं इतना सुनकर अपने कमरे में वापस आ गया मुझे मिठ्ठन लाल जी की याद आई। और मैं फिर छुट्टी में जब घर गया तो उनसे मिलने जरूर गया। घर जाकर पता चला की पापाजी का स्थानान्तरण हो गया है।


समय बीतता गया स्थानान्तरण के बाद मैं मिठ्ठन लाल जी से नहीं मिल पाया क्योंकि कभी वहां जाने का मौका ही मिला लेकिन जब भी मैं उस बच्चे को देखता तो मुझे न जाने क्यों बरबस ही उनकी याद आ जाती


मैंने वकालत करके अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी और कुछ समय बाद मेरा विवाह भी पक्का हो गया। मैं अपनी शादी का कार्ड लेकर बाबूजी यानी मिट्ठन लाल जी के पास मिलने गया तो पता चला की वो अब वहां नहीं रहते कुछ लोगों से पता चला की वो अब एक वृद्धाश्रम में रहते हैं जो किसी और शहर में हैं। हालांकि वो जगह वहां से काफी दूर थी लेकिन मैंने वहां जाने का मन बनाया और वृद्धाश्रम गया मुझे लग रहा था की आज भी वो मिलकर मुझसे यही कहेंगे की ” की तुम तो मेरे राम हो”. परन्तु शायद मैंने वहां पहुँचने में भी बहुत देर कर दी थी वो इस छदम राम को छोड़ राम के पास जा चुके थे मुझे उनके विषय और कुछ पता नहीं चला। वो तो सदा मुझे अपना राम मानते रहे पर शायद मैं राम न बन सका।


वहां से लौटते वक्त मुझे उस बच्चे की याद आ रही थी और मैं सोच रहा था की उस बच्चे में और मिट्ठन लाल जी में क्या फर्क है और क्या मैं उस बच्चे के लिए राम बन पाऊंगा …………….. ! या उसके लिए भी सिर्फ राम का ही आसरा है


अब वो बच्चा तेरह चौदह साल का है किसी बोर्डिंग स्कूल में पढता है परन्तु कभी घर नहीं आता छुट्टियों में भी नहीं

(ये एक वास्तविक प्रसंग है )



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 21, 2013

आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! आपने वास्तविक प्रसंग के माध्यम से आज की वास्तविकता को सामने रखा है … लगभग पूरा समाज इसी स्थिति को प्राप्त होता जा रहा है. अब एक पंक्ति जो आपसे साझा करना चाह रहा हूँ – तिफ़्ल को कैसे ऐतवार हो माँ बाप के ईमान की, दूध बंद डब्बे का है, तालीम इंगलिस्तान की …. आज विकासशील मानव मशीन बनता जा रहा है तो उसमे भावनाएं कहाँ से आयेगी … अभी मैंने लिखा है “आखिर कितना पैसा चाहिए?” यह भी आज के सन्दर्भों पर ही आधारित है. अगर समय मिले तो अवलोकन करें!..


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