JANMANCH

तथ्य कई हैं पर सत्य एक है.

75 Posts

1349 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2804 postid : 399

"मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ"

Posted On: 23 Feb, 2013 Others,मस्ती मालगाड़ी में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

उफ़ ! इतना दुःख
अब सहा भी न जाता
ये राज
किसी से कहा भी न जाता
मनों वज़न मेरे मन पर धरा था,
सच कह रहा हूँ
मैं बहुत दुखी था।
दुखों को दूर करने का
मैंने इरादा कर लिया,
कड़ा मन करके
आत्महत्या का प्रण लिया
फिर भी कुछ शंका
मेरे मन में उभर रही थी
आत्महत्या करना
कोई अच्छी बात तो न थी
लोग -
जाने क्या क्या कहेंगे
पड़ोसी बातें करेंगे, सम्बन्धी रोयेंगे।
मैंने मन को समझाया
भगवान् राम
का स्मरण हो आया।
भगवान् ने
सरयू में डूबकर प्राण गवाएं थे,
हम कैसे पीछे रह सकते हैं।
उन्होंने
आत्महत्या का आगाज़ किया,
हम अंजाम तक पहुंचा सकते हैं।
फिर भी,
हम चुपचाप नहीं मर सकते थे
किसी से कुछ
छिपा नहीं सकते थे।
आखिर,
मरने ही तो जाना था
इसमें किसी से क्या छिपाना था।
ये सोच कर मित्र को बताया
हालेगम कह सुनाया
“मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ”
और सिर्फ तुम्ही को बता रहा हूँ
मित्र ने कान हिलाए,
फिर गाल बजाये -
” कुछ नोट-शोट मिलें तो हम भी चलें”
सूरा सुंदरी मिले तो यहाँ क्यों रहें।
मैंने समझाया
मित्र
“मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ”
और सिर्फ तुम्ही को बता रहा हूँ
वो बोला
काम कुछ बुरा नहीं चाहे जो करो
जहां पैसा न हो वहाँ मत रहो,
पर एक बात ध्यान रखना
पैसा पाते ही
मुझे मत भूल जाना।
कुछ अटपटा लगा
ये कुछ सीरियस ही नहीं है
हम मर रहे हैं
और इसे सुरा सुंदरी दिख रही है।
इसे छोडो, मैं भाई को बतलाता हूँ
मरने का कार्यक्रम
उसी को समझाता हूँ
वो छोटा भाई है तुरंत समझ जाएगा
अंत समय में अपना ही काम आएगा।
ये सोच भाई को कहा
“मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ”
और सिर्फ तुम्ही को बता रहा हूँ
वो बोला -
जा रहे हो तो जाओ,
पर मेरे लिए
क्या लाओगे ये बताओ।
हर बार की तरह हाथ हिलाते मत चले आना
कम से कम एक टाफी ही दाल लाना।
सुनकर
झटका लगा,
मैं सोचने लगा
इस दुनियां में कोई अपना नहीं है,
किसी को सुंदरी की
तो किसी को टाफी की लगी है
अब
मम्मी का ख़याल आया
घने अँधेरे में
उजाला नज़र आया।
आखिर मरने जाना था
किसी को तो बताना था
मम्मी को ही बताता हूँ
फिर किसी नदी में डूब जाता हूँ
ये सोच
मम्मी से कहा
“मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ”
और सिर्फ तुम्ही …………………!
वो बोली
जा रहा है तो जा
पर संभल कर जाना
शाम होते ही लौट आना।
किसी से मत झगड़ना
पैसा संभाल कर रखना।
आज अहसास हुआ
कृष्ण ने “गीता” का उपदेश क्यों दिया था
सबको छोड़ कर,
मैं ही, “मोह” के
भ्रमजाल में फंसा था
सभी ज्ञानी ध्यानी थे
मैं ही अज्ञानी था
पर क्या करूँ
मोह फिर भी न गया
पिताजी का ख़याल आ गया
सोचा
पिता जी को ही बताता हूँ
फिर हलाहल खाता हूँ
मैं पिताजी के समक्ष आया
थोडा सहमा थोडा घबराया
फिर साहस कर बोला -
“मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ”
और सिर्फ तुम्ही को बता रहा हूँ
वो बोले -
पढ़ाई में दिमाग लगाते नहीं हो,
घर में कभी टिकते नहीं हो।
“जीन कसे घोड़े” की तरह घुमते हो,
और हमें बेवकूफ समझते हो।
पहले बैठकर पढ़ाई करोगे,
फिर घर का काम करोगे।
फिर बाज़ार से सब्जी लाना,
तब जहां जाना हो चले जाना।
पिताजी की फटकार से
मूड खराब हो गया,
मरने का कार्यक्रम चौपट हो गया।
भला
खराब मन से भी कोई
अच्छा कार्य होता है,
और इतनी डांट सुनकर भी कोई मरता है।
अब तो मैं,
बुढापे तक सब की छाती पर मूंग दलूँगा
पर अफ़सोस,
भगवान् राम नहीं बन सकूंगा।
(कृपया पाठकगण भगवान् राम के प्रसंग को अन्यथा न लें)



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (17 votes, average: 4.71 out of 5)
Loading ... Loading ...

17 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pooja के द्वारा
November 20, 2013

बहुत ही सुन्दर रचना.

Sumit के द्वारा
March 3, 2013

अगली बार अकेले न जाये, किसी को साथ लेके जाये, तब शायद आप राम जी जरुर बन पाए, (क्युकी कभी कभी दुसरो का भाग्य भी साथ देता है ) हा हा हा हा

yogi sarswat के द्वारा
February 26, 2013

वो बोले – पढ़ाई में दिमाग लगाते नहीं हो, घर में कभी टिकते नहीं हो। “जीन कसे घोड़े” की तरह घुमते हो, और हमें बेवकूफ समझते हो। पहले बैठकर पढ़ाई करोगे, फिर घर का काम करोगे। फिर बाज़ार से सब्जी लाना, तब जहां जाना हो चले जाना। पिताजी की फटकार से मूड खराब हो गया, मरने का कार्यक्रम चौपट हो गया। गज़ब आदरणीय मुनीश जी ! बहुत सुन्दर ! मरने की बात भी हंसी ला दे यह भी कभी कभी ही होता है.और उसमे से एक कभी तो आज आपने ला ही दिया है. वैसे आपका जो चित्र दिख रहा है उसमे भी आप फंदे पर टंगे ही नजर आ रहे हैं एक सुर्ख लाल मखमली फंदा. सुन्दर मनोरंजक

    munish के द्वारा
    February 27, 2013

    आदरणीय योगी जी, दुनिया रो रोकर जीवन काट रही है और हम हँस कर मरें भी न …….. :)

yogi sarswat के द्वारा
February 26, 2013

हम मर रहे हैं और इसे सुरा सुंदरी दिख रही है। इसे छोडो, मैं भाई को बतलाता हूँ मरने का कार्यक्रम उसी को समझाता हूँ वो छोटा भाई है तुरंत समझ जाएगा अंत समय में अपना ही काम आएगा मूड खराब हो गया, मरने का कार्यक्रम चौपट हो गया। भला खराब मन से भी कोई अच्छा कार्य होता है, और इतनी डांट सुनकर भी कोई मरता है। अब तो मैं, बुढापे तक सब की छाती पर मूंग दलूँगा पर अफ़सोस, भगवान् राम नहीं बन सकूंगा। हे भगवान् ! गज़ब

akraktale के द्वारा
February 25, 2013

मुनीश जी वाह! मरने की बात भी हंसी ला दे यह भी कभी कभी ही होता है.और उसमे से एक कभी तो आज आपने ला ही दिया है. वैसे आपका जो चित्र दिख रहा है उसमे भी आप फंदे पर टंगे ही नजर आ रहे हैं एक सुर्ख लाल मखमली फंदा. सुन्दर मनोरंजक रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें.

    munish के द्वारा
    February 27, 2013

    आदरणीय रक्ताले जी सादर, आपने सही पहचाना फंदा तो मेरे गले में बहुत सालों पहले ही पद गया था अब तो जब तब खिंचने के दर से बस चुप चाप फंदे को सहे जा रहे हैं :) और अब जब भी कभी इस तरह के कार्यक्रम में जाने का मौका मिलता है तो में छोड़ता किसी और के गले में फंदा डालने से………. बस वही फोटो है

nishamittal के द्वारा
February 25, 2013

इतना सोचने का अर्थ तो यही है की आप गंभीर नहीं थे और शेष सभी इसको कोई चुटीली बात समझ कर आनन्द ले रहे थे.

    munish के द्वारा
    February 26, 2013

    आदरणीय निशा जी सादर अभिवादन, मैं तो अपने बड़ों की नसीहत पर ही चल रहा था आत्महत्या पर भी सोच विचार कर निर्णय ले रहा था मैं तो हँसने की बात पर भी गंभीरता से निर्णय लेता हूँ आज सुने चुटकले पर दो दिन बाद ही हँसता हूँ पता नहीं क्यों लोग मेरी गंभीरता में भी आनंद लेते हैं जबकि हम तो हँसते समय भी गंभीर रहते हैं

D33P के द्वारा
February 24, 2013

आत्महत्या के इस स्टेज शो में आनद आ गया .पर मरने वाला इतना सोचता है ये आज पता चला ..सहज प्रस्तुति के लिए आभार

    munish के द्वारा
    February 26, 2013

    आदरणीय ….. सादर बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए, काम बिगारे आपनो जग में होत हसाय . अब आप ही बताइये मैं मरने का कार्यक्रम ऐसे कैसे जल्दबाजी में कर देता :)

    munish के द्वारा
    February 26, 2013

    शुक्रिया शालिनी जी

jlsingh के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! आत्म हत्या के बहाने आपने जो अपनी आप बीती सुनायी, मैं तो थोड़ा समझा, थोड़ी अपनी बीवी को भी समझाई, मेरी बीवी तो मुझसे ज्यादा समझदार निकली … कहने लगी, “अगर तुम्हे भी मुनीश जी जैसा मरना है, तो याद रखना ऐसा कुछ करने से पहले महीने भर का राशन रख जाना बीमा की पोलिसी कहाँ रखे हो बताकर जाना! ऐसे भी, हर महीने के आखिरी में जेब खर्च मुझसे ही मांगते हो! पता नहीं, दिन भर ऑफिस में क्या झख मारते हो! मेरी तो सिट्टी पिट्टी हो गयी गुम क्या इसी दिन के लिए पत्नी से प्यार करते थे हम! इस जहाँ के नौनिहालों! जरा इस कविता को पढो और खुद को सम्हालो यूं आत्म हत्या का ख्याल भी दिल में न पालो अगर मन में कुछ है तो किसी के सामने कह डालो! पुन; प्रणाम करता हूँ, हे महोदय आपकी कविता हमें बहुत कुछ सिखा गयी नित्य आत्महत्या की ख़बरें पैदा करने वाले नौनिहाल! इसे जरूर पढ़ें और इस कविता से, यानी आपकी कविता से सबक लें….. जीवन तो सुख और दुःख के बीच ही पलता है ज्यादा खुशी होने से अपनों का ही दिल जलता है!

    munish के द्वारा
    February 26, 2013

    आदरणीय सिंह साहब मुझे श्रीमती जी के रिएक्शन का पहले से ही अंदाजा था इसीलिए मरने का कार्यक्रम उन्हें नहीं बताया था. फिर केवल बीमा पालिसी से काम न चलता महीने के राशन से क्या होता वो तो यमराज को यहीं पकड़ लेतीं उसे भी मेरे साथ कोल्हू में पीस देतीं बच्चू को छठी का दूध याद आ जाता मेरे तो मेरे अपने भी प्राण यहीं छोड़ जाता श्रीमती जी सटी सावित्री से कम नहीं हैं मैं ऐसा समझता हूँ श्रीमती के मामले में, मैं हमेशा पोजिटिव ही रहता हूँ :)

shashi bhushan के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय मुनीश जी, सादर ! इस आत्महत्या के रंगारंग कार्यक्रम से जीवन-व्यापार का कार्यक्रम कितना महत्वपूर्ण होता है, यह मुझे भी कुछ-कुछ समझ में आ रहा है ! कार्यक्रम पोस्टपोंड कर पुनः कोल्हू में जुटने के लिए हार्दिक बधाई !

    munish के द्वारा
    February 26, 2013

    आदरणीय शशि भूषन जी सादर अभिवादन जीवन महत्वपूर्ण है ये बात सभी को समझनी चाहिए क्या हम छोटी छोटी समस्याओं से तंग आकर जीवन को समाप्त कर दें ये गलत है हमें जीवन जीने के लिए आशावादी द्रष्टिकोण रखना चाहिए जैसे ही जीवन का महत्त्व समझ मैं आया पुनः कोल्हू में जुतगया


topic of the week



latest from jagran