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पुरुषों सावधान....!

Posted On: 10 Oct, 2011 मस्ती मालगाड़ी में

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नारी सदियों से पुरुषों द्वारा शोषित रही है, उस पर जुल्म होते आये हैं, वो अबला है पुरुष अत्याचारी है और न जाने क्या क्या ……… ये सुन सुन कर अब तो मेरे कानों में दर्द रहने लगा है पर क्या करूँ…… मैं अपने मन की बात किसी से कह नहीं पाता  हूँ अतः मैंने सोचा क्यों न जागरण के मित्रों को ही अपने मन की बात कह दूँ


साथियों, वास्तव में हम पुरुष सदियों से इस भ्रमजाल में जी रहे हैं की हमारा समाज एक पुरुषप्रधान समाज है, और ये प्रपंच भी किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं नारी समाज द्वारा रचाया गया है. आप में से कोई भी पुरुष इस बात से इनकार नहीं कर सकता की स्वाभाव से हम पुरुष बहुत सीधे होते हैं और जब तक हमें चालाकी के गुण न सिखाये जाएँ तब तक नहीं सीखते….. (आमतौर पर आपने छोटे बच्चों में महसूस किया होगा की बचपन में लडकियां अधिक तेज़ होती है और लड़के कुछ भोंदू किस्म के ये जन्मजात है) अर्थात न हम पुरुषों में छल कपट होता है और न ही किसी को परेशान करने की प्रवर्ती, वो तो अगर रोटी बिना मेहनत के मिल जाती तो पुरुष कुछ न करते खाली बैठकर हुक्का गुडगुडाते…….. खैर मैं स्त्रियों के प्रपंच की बात कर रहा था ……….”नारी जाति” शुरू से ही तेज़ रही है उन्होंने पुरुषों के नाम कुछ भी नहीं होने दिया……. स्वयं को तो देवी बनाकर समाज के सामने प्रस्तुत किया और हम पुरुषों को ….. देवता नहीं बनने दिया……! आपने अक्सर सभाओं में, कार्यक्रमों में, देखा होगा सब लोग ” देवियों और

सज्जनों” कहकर संबोधित करते हैं, कोई भी देवियों और देवताओं अथवा सज्जनों एवं सज्जनियों नहीं कहता ……!

नारियों ने हम पुरुषों को कभी बराबरी के लायक नहीं समझा…..! सदा तुच्छ दृष्टि से ही देखा .


भेदभाव हम पुरुषों के साथ बचपन से ही शुरू हो जाता है और हमें पता भी नहीं चलने पाता…… की हम पुरुष भेदभाव के शिकार हो रहे हैं, हमारे परमपूजनीय गुरुजन तक इस भेदभाव को नहीं समझ पाए (आखिर वो भी तो पुरुष ही हैं) वो भी शिक्षा के दौरान गलती हो जाने पर हमें तो ”मुर्गा” बना देते पर कभी भी किसी कन्या को मुर्गी नहीं बनाया.  हम पुरुषों को सदा जानवर के बराबर ही समझा और उसी की उपमाएं मिली ……..जैसे गधा, उल्लू, मुर्गा,  इस बात को आप एक छोटी सी बात से समझ सकते हैं. ……..” यदि किसी लड़के को किसी लड़की से प्यार हो जाता है और वो अपने माँ-बाप से इसके विषय में कहता है तो वो उस लड़के को डांट लगाते हुए कहेंगे….. ” अबे गधे ! कौन है वो लड़की, जिसके चक्कर में तुम आ गए ……..” अब यदि किसी लड़की को किसी लड़के से प्यार हो जाए और वो इस विषय में अपने माँ-बाप से कहेगी तो वो भी डांट लगाते हुए कहेंगे…….” अरे कौन है वो गधा, जिसके चक्कर में तुम आ गयीं………! मसलन दोनों परिस्थितियों में “गधा” पुरुष ही रहने वाला है. यानी हम नारियों ने हमें कभी इंसान भी नहीं समझा और आदिकाल से ही ये बातें हमारे कानों में इस तरह डाली गयी कि अब तो हम पुरुष स्वयं ही एक दुसरे को गधा इत्यादि कहते हैं


इन नारियों ने पुरुषों को बेवकूफ बनाकर सारे मुख्य काम भी आपस में देवियों को ही दिए देवताओं को कुछ नहीं………. जैसे ”शक्ति” की देवी दुर्गा, (न की देवता) ”विद्या” की देवी सरस्वती और तो “धन” की भी देवी हैं माता लक्ष्मी न की कोई देवता……… इन चालों को न तो देवता ही समझ पाए और न ही हम प्रथ्वी वासी पुरुष. और पुरुषों में देखिये ब्रहमाजी कमल के फूल पर सो रहे हैं, तो शंकर जी पहाड़ पर चढ़कर बैठे-बैठे ही सो रहे हैं और विष्णु जी ने तो हद ही कर दी…… वो तो पानी के अन्दर भी मजे से सो रहे हैं…….. ये केवल नींद का डिपार्टमेंट हम पुरुषों के पास है.


हालांकि कुछ विद्वानों ने हमेशा से ही पुरुष को नारी से सचेत रहने को कहा ” पर हम सब अबला पुरुष नारी के सोंदर्य रुपी जाल में फंस ही जाते  हैं, और फिर कुछ कर नहीं पाते” नारी ने शुरू से ही फूट डालो और राज करो की तर्ज पर हम पुरुषों को कभी एक साथ नहीं रहने दिया और अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए हम पुरुषों को आपस में लड़ाती रही…….. अजी पूरी महाभारत करा दी पर हम सीधे साधे पुरुष इस भ्रमजाल में जीते रहे की पुरुष प्रधान होता है……. ! रावण जैसा भला राक्षस भी एक स्त्री के कारण जान गवां बैठा, सच तो यह है कि  लड़ाई की मुख्य जड़ है नारी….. कहा भी गया है की लड़ाइयों के तीन ही कारण होते हैं जर,जोरू और जमीन ……..

पुरुषों ने हमेशा नारियों से बचने की कोशिश की पर बच नहीं पाए………. इतिहास  इस बात का साक्षी है ” एक बार की बात है दो पति पत्नी थे सत्यवान और सावित्री……. सत्यवान अपनी पत्नी से बहुत दुखी रहता था बेचारा वो कमजोर पुरुष जब कोई उपाय उसके पास न बचा तो
उसने यमराज से प्रार्थना की कि वो उसे अपने साथ ले जाएँ.    ………. यमराज आये और उसके प्राणों को लेकर चल दिए, जैसे ही सावित्री को इस बात का पता चला तो वो पहुँच गयी यमराज के पास …….. और भाइयों,…….  ऐसी डांट पिलाई कि यमराज ने सत्यवान के प्राण छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी ………..मोरल ऑफ़ द स्टोरी ये कि “पुरुष को नारियों के हाथों से कोई भी नहीं बचा सकता ………यमराज भी नहीं………..! और बाद में सावित्री ने जो बताया वो सब आपको पता ही है सब लोग उनकी भी पूजा करने लगे

( इस प्राचीन कहानी को मैंने इस तरह से लिखा है कि उसका मोरल  बदल गया है…….हालांकि मेरा मकसद केवल हास्य लिखना ही है और किसी के दिल को ठेस पहुँचाना बिलकुल नहीं है, फिर भी किसी को इस कहानी से ठेस पहुँचती है तो में क्षमाप्रार्थी हूँ….)


नारियों ने पुरुषों को सदा देवता बना कर रखा……. प्रथ्वी पर एक मात्र जीवित देव हैं “ पतिदेव”. परन्तु वो उसी देवता के सामान है जिसको केवल हर परिस्थिति में मुस्कराने का अधिकार है कुछ कहने, सुनने, और बोलने का नहीं, अब देखिये कहती हैं कि ये पुरुष प्रधान समाज है इसलिए समाज के काम हमारे पास रहे उदहारण स्वरुप, ईरान-ईराक कि लड़ाई में कौन जीतेगा, सरकार किसकी बनेगी, अमेरिका कि अगली रणनीति क्या होगी……. आदि आदि,  और घर के कार्य नारियों के पास घर में क्या खरीदकर लाना है, क्या नहीं, जेवरात क्या खरीदने हैं, टीवी कैसा होगा सोफा कौनसा लाना है……… शादी के लिए लड़के अथवा लड़की का चयन आदि आदि…… सब नारियों कि सलाह से होता है पुरुष अपनी इच्छा से तो पानी भी नहीं पी सकता……. साहब केवल देखाने के मकसद से हम पुरुषों से रोज़ पुछा जाता है…….” सुनिए जी, आज खाने में क्या बनाऊं……..!” वास्तव में वो भी वो अपनी मर्जी से ही बना देती है यकीन न आये तो आप उनको बताकर देख लीजिये वाही नहीं बनेगा जो आप कहेंगे ………..!
वास्तव में शोषण तो पुरुष समाज का होता आया है आदिकाल से ही परन्तु स्त्रियों ने ऐसा मायाजाल रचा कि सब पुरुष ये सोचने लगे कि स्त्रियों के साथ अत्याचार हो रहा है…… कुछ समय पहले मैं भी बहक गया था जब अनीता जी के लेख बराबर पढ़ रहा था,  वो तो राजकमल जी जैसे विद्वानों ने समय समय पर हम कमजोर पुरुषों को दिग्भ्रमित होने से बचाया है……

अब मैं आगे क्या लिखूं इस मंच पर सभी विद्वान हैं, मैंने तो सिर्फ आंखें ही खोलनी थीं बाकी तो आप स्वयं ही………..!



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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
June 20, 2014

मुनीष जी. आपने हास्य में बहुत कुछ सोचने  के लिए बहुत कुछ है।

drvandnasharma के द्वारा
March 15, 2013

hahahaaaaaaaaaaaaa bahut sundr aapka lekh padhkar bahut achha laga, man khus ho gya kya khub likhte hai aap, badhai, hum to aapke vicharo se sehmat hai

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 12, 2011

आदरणीय मुनीश जी ….सादर अभिवादन ! मैं किसी का भी कर्ज अपने उपर नहीं रखता हूँ …. आपका जिक्र भी मैंने अपने थोड़े दिन पहले लिखे गए लेख “जब जागरण गांव की सभी महिलाओं ने की प्यार की हड़ताल” में किया है …. आपसे कमेन्ट के लिए नहीं मगर पढ़ने के लिए जरूर कहना चाहूँगा ….. ******************************************************* मेरा यह मानना है की सभी को पहले एक बार पड़ प्रदान करके कुर्सियों पर बैठा दिया जाए ….. बाद में कार्यक्षमता के आधार पर कैबिनेट में फेरबदल और रद्दोबदल होता रहेगा …. जो कुर्सी नहीं छोड़ेगा उसके लिए मैं तो हूँ ना …. हा हा हा हा हा बढ़िया गधामय वयंग्य मुबारकबाद (कल से ट्राई कर रहा हूँ आज सफलता मिली है )

    munish के द्वारा
    October 12, 2011

    आदरणीय राज कमल जी, आपको मेरा व्यंग पसंद आया इसका मतलब अब मैं ठीक ठाक लिख लेता हूँ वर्ना तो लगता था ऐसे ही कलम भांज रहा हूँ.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 11, 2011

मुनीश भाई, निरुत्तर कर दिया आपके व्यंग्य ने। आपने ऐसे शानदार अंदाज़ में अपने लेख को प्रस्तुत किया है कि जो अविवेकी हो वो भी सोचने पर मजबूर हो जाए। मेरे पास तो फिर भी थोड़ा सामर्थ्य है सोचने भर का।  साधुवाद आपको,

    munish के द्वारा
    October 12, 2011

    शुक्रिया वाहिद भाई, सोचिये — सोचिये और पुरुष समाज के लिए कुछ कीजिये……

Tamanna के द्वारा
October 11, 2011

मुनीष जी, बहुत रोचक लेख..उदाहरण तो लाजवाब हैं. वैसे मैं निशा जी की बात से भी सहमत हूं…आपका व्यंग्यात्मक लहजा वाकई काबिल-ए-तारीफ है.

    munish के द्वारा
    October 11, 2011

    शुक्रिया तमन्नाजी, लेकिन आप ये न समझिएगा की आपकी तारीफ़ करने के बाद मैं सच लिखना बंद कर दूंगा……….!

nishamittal के द्वारा
October 11, 2011

कृपया अपनी पत्नी का सम्पर्क नम्बर दें तो पूछती हूँ उनसे आपकी व्यथा का कारण

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 11, 2011

    वाह वाह निशाजी वाह !….असली तीर अब मारा है ,…सादर प्रणाम

    munish के द्वारा
    October 11, 2011

    आदरणीय निशाजी, मुझे पहले से ही उम्मीद थी की कोई न कोई मेरे से मेरी श्रीमती जी, नंबर जरूर मांगेगा….. इससे यही सिद्ध होता है की सच सहन नहीं हो रहा और आप लोग मेरी रोटी बंद करने के जुगाड़ में हैं……….! साभार

    munish के द्वारा
    October 11, 2011

    और संतोषजी ये क्या …… आप हाथ सेंकने को तैयार बैठे हैं

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 12, 2011

    अरे नहीं मुनीश जी ,..हाथ नहीं सेंकना चाहता हूँ ,..लेकिन आपके दर्द का अंत –तुरंत होना चाहिए ,..हा हा हा ..

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    परन्तु मैं देख सकती हूँ कि आप की स्थिति इस समय वही है जो केवल सच कहने का दावा ठोक रहे हैं,परन्तु नम इसलिए नहीं दे रहे हैं,कि आपकी वास्तविकता जागरण के सामने आ जायेगी.(मज़ाक है कृपया गंभीरता से न लें )

    munish के द्वारा
    October 14, 2011

    आदरणीय निशाजी, मैंने आपके पास लिंक भिजवा दिया है……… अब बाकी मेहनत आपने स्वयं ही करनी पड़ेगी नंबर के लिए……….!

Santosh Kumar के द्वारा
October 11, 2011

आदरणीय मुनीश जी ,.सादर नमस्कार आपका मजेदार नजरिया वाकई नजर बढ़ने का काम करेगी ,..अब इंतज़ार है गुरुदेव का अपने अमूल्य शब्दों से ज्ञानवर्धन कर पुरुषों का खोया आत्मविश्वास जगाएं ,..साभार http://santo1979.jagranjunction.com/

    munish के द्वारा
    October 11, 2011

    आदरणीय संतोषजी, मैंने वास्तविक पुरुष व्यथा लिखने की कोशिश की अब आपको सच मजेदार लग रहा है……ये भी नारियों द्वारा बनाया गया आभा मंडल है की हम पुरुषों को अपनी ही कथा मजेदार लग रही है……..?

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 12, 2011

    आदरणीय मुनीश जी ,.सादर अभिवादन जब पडोसी के यहाँ खटपट होती है तो अपने घर से मजे लेना हमारा पुराना टैमपास है ,..सच भी मजेदार होता है ,…बाकी नारी शक्ति के आगे नतमस्तक तो होना ही पड़ेगा ,…आपकी बातें सदैव दिमाग में रखने वाली हैं,.लेकिन दिल से यह नहीं भूलूंगा कि,..त्याग ,सहनशीलता ,समर्पण ,धैर्य में नारी के आगे हम कुछ भी नहीं ,.. अमिता पाल जी जैसी सोच से भ्रमित जरूर हो जाता हूँ ,…आजकल समाज का माहौल देखकर डर तो लगेगा ही ,..और डरना जरूरी है !!!.साभार

akraktale के द्वारा
October 11, 2011

मुनीश जी नमस्कार, बहुत हिम्मत करके लिखा है आपने मगर फिरभी अंत में डर ही गए ना! और क्षमा मांगने लगे. भाई साहब यहाँ क्षमा का कोई काम नहीं है या तो बेलन के लिए तैयार रहो या फिर ब्लेक मेलिंग के लिए और तिस पर अभी मौसम भी ब्लेक मेलिंग के अनुकूल है. आपने बहुत ही खुबसूरत अंदाज में पुरुष वर्ग का पक्ष रखा, कोई बात नहीं यदि एक दिन घर पर खाना न मिले, हमारी बधाइयों से काम चला लेना.बधाई.

    munish के द्वारा
    October 11, 2011

    अब भाई साहब एक दिन का खाना तो तभी नहीं मिला जब श्रीमतीजी को पता चला की मैं ऐसा कुछ लिख रहा हूँ, अभी तो उन्होंने पढ़ा नहीं है वर्ना तो भगवान् ही जाने कितने दिन का खाना……….

jlsingh के द्वारा
October 10, 2011

मुनीश बाबु, (देव लिखने की हिम्मत मैं भी नहीं कर पा रहा हूँ) आपने बहुत शोध के बाद हमसबकी आंख खोलने में मदद की है. वास्तव में पुरुष निरीह प्राणी है और कुछ खुलकर कहने के बजे लिख कर ही संतोष कर लेता है. बहुत मजा आया आपके लेख को पढ़कर! आपकी अनुपस्थिति बहुत दिनों से खल रही थी. बहुत बहुत बधाई जो अपने इतनी हिम्मत जुटाई और हम पुरुषों की विवशता का अहसास कराया! — जवाहर!

    munish के द्वारा
    October 11, 2011

    आदरणीय सिंह साहब, आपको लेख पढने के बाद पुरुषों की विवशता का अहसास हुआ……. अतः अब मुझे आगे की कार्यवाही करनी चाहिए….. ” पुरुष जागरण मंच “

abodhbaalak के द्वारा
October 10, 2011

मुनीश जी क्या बात है, आपने तो बहुत दूर की ……………… क्यों न आप एक नारी पीड़ित संगठन बनाए और उसके प्रेसिडेंट ………… मज़ेदार हास्य, आपका एक नया रूप http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    munish के द्वारा
    October 10, 2011

    आपका ख्याल अच्छा है, लेकिन संगठन का नाम पुरुष जागरण मंच रखेंगे …….. प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया

    syeds के द्वारा
    October 10, 2011

    मुनीश जी,खूबसूरत हास्य रचना ….क्यूँ ना संगठन का नाम ‘जागरण पुरुष आयोग’ रखा जाये… बधाई http://syeds.jagranjunction.com

    munish के द्वारा
    October 10, 2011

    आपका सुझाया नाम भी अच्छा है, ……… बाकी अगर कोई और कमी है भी तो वो आदरणीय राजकमलजी, पूरी कर देंगे साभार

    Dharam के द्वारा
    October 11, 2011

    मुनीश जी बहुत ही मजेदार लेख लगा. आपकी बातो मे बहुत सच्चाई है. लेकिन हकीकत ये है की हम सच से भाग नहीं सकते सिर्फ उसका सामना “((दिमाग से))” कर सकते है. मुझे तो इस ब्यथा का कोई समाधान नहीं दिखता. इसलिए मे आपको इस विषय को चतुराई से लेने का अनुगह करूँगा. क्योंकि वो एक कहावत है खली पेट तो भजन भी नहीं होते.

    munish के द्वारा
    October 12, 2011

    शुक्रिया धरमजी, अब आप भी पुरुष जागरण मंच में शामिल हो जाएँ


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