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तथ्य कई हैं पर सत्य एक है.

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munish


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दधिची बनिये

Posted On: 13 Mar, 2015  
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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ……………………!

Posted On: 24 Jan, 2015  
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हमारे बुजुर्ग और समाज – समस्याएं और निदान

Posted On: 16 Jun, 2014  
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सिद्धांत विकासवाद का या पतनवाद का

Posted On: 13 Jun, 2014  
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२०१४ मंगलमय हो

Posted On: 31 Dec, 2013  
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“करवाचौथ” और मेरा व्रत

Posted On: 21 Oct, 2013  
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Others Others social issues मस्ती मालगाड़ी में

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रामराज्य : अर्थात समाजवाद

Posted On: 18 Oct, 2013  
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श्रीमती जी का इज़हार ए मोहब्बत

Posted On: 13 Jul, 2013  
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तो क्या ये लोक पर तंत्र का हमला नहीं है ?

Posted On: 27 May, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय सिंह साहब सादर अभिवादन, मैंने धर्म को जानबूझकर इस मसले से दूर रखा, क्योंकि जब हम भारत में धर्म की बात करते हैं तो मुख्यतः दो ही धर्म आते हैं हिन्दू और मुसलमान, कोई माने या न माने लेकिन ये सच है की मुसलमान आक्रांता के रूप में भारत आये, ऐसा नहीं है की मुसलमान ही विदेशी आक्रांता थे बल्कि उनसे पूर्व शक, हुन, पारसी और अन्य भी लोग भी भारत आये लेकिन आज आप उनमें से किसी को नहीं पहचान सकते की वो कौन हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को आत्मसात किया लेकिन मुसलामानों ने अपने आप को एक शाषक और विजेता की तरह ही रखा और आज तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता में रचे बसे नहीं हैं, कहते हैं भारत की गंगा जमुनी तहजीब .............. ! वो इतिहास का कौन सा कालखण्ड है जब वास्तव में दोनों धर्मों के मानने वालों ने इस तहजीब (जो की मुझे नहीं पता कौन सी है) के अनुसार आचरण किया हो, इसीलिए मैंने धर्म को अपने लेख से दूर रखा .

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: munish munish

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"अब एक तीसरी स्थिति ये है की जब दूसरी स्थिति वाले बुजुर्ग जो वाकई में प्रताड़ित हैं पहली स्थिति वाले बुजुर्गों से मिलते हैं (जो की वास्तव में उपेक्षित नहीं हैं केवल समयाभाव या गलत समय प्रबंधन के कारण अपने बच्चों के साथ प्रयाप्त समय नहीं बिता पाते हैं ) और विचारों का अपनी स्थिति का आदान प्रदान करते हैं और जब पहली स्थिति वाले बुजुर्ग दूसरी स्थिति वाले बुजुर्गों की व्यथा सुनते हैं तो वातावरण में एक नकारात्मकता का भाव उत्पन्न होता है जो सारे समाज और विशेषकर बुजुर्गों के विचारों में संशय की स्थिति उत्पन्न करता है। अर्थात यदि बुजुर्गों की समाज में स्थिति यदि दस प्रतिशत वास्तविक है तो नब्बे प्रतिशत केवल नकारात्मक वातावरण के कारण है हो सकता प्रतिशतता के आंकड़े में मैं गलत होऊं लेकिन मेरे विचार में वस्तुस्थिति शायद कुछ ऐसी ही है।" आपकी सोच सार्थक और विचारणीय है , सिक्के के हर पहलू को देखना चाहिए. साप्ताहिक सम्मान की बधाई

के द्वारा:

युवाओं को भी समय प्रबंधन थोड़ा ठीक करना होगा और अपने बुजुर्गों को सम्मान देना होगा आखिर वो आज जो कुछ भी हैं अपने बुजुर्गों के कारण ही हैं। साथ ही बुजुर्गों को भी आज की समय और परिस्थितियों को देखते हुए बच्चों के विषय में सकारात्मक रुख अपनाना होगा। अंत में मैं यही कहूँगा की हमें एक स्वस्थ और मजबूत समाज की रचना के लिए अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शन और युवाओं के जोश की आवश्यकता है न की एक दुसरे को तिरस्कृत कर टूटे हुए समाज की ! आदरणीय मुनीश बाबू, सादर अभिवादन! आपके विचार संतुलित और सधे हुए हैं.... मेरा अनुभव यह बतलाता है आज बुजुर्गों की बात सुनने वाला कोई नहीं है ... समय का अभाव कहें या या नया चाव ...पुरानी चीजों से हम दूर ही भागते हैं ...मेरे पिताजी, किसान थे, दिन भर खेत में काम करने के बाद रात में लालटेन के प्रकाश में रामायण पढ़कर गांव के लोगों को सुनाते समझाते थे. ... तब लोग सुनते थे चाव से ...अब कौन सुनेगा ..जहाँ रामलीला फिल्मों और टी वी चैनलों पर दिखलाई जाती है ज्यादा रोचक तरीके से. फिर भी समाधान और सामंजस्य जरूरी है...सादर! .

के द्वारा: jlsingh jlsingh

न बीयर हो न बार हो, हाँ बाला चलेगी जो नए वर्ष को नया करने में सहयोग दे ... प्रणाम महोदय! आप गम्भीरतम बात में भी एक चुटकी नमक दाल ही देते हैं! यानी कि मधुशाला से तिलांजलि और मधुबाला की स्वरांजलि! ग्रेगोरियन कैलेंडर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हार्दिक आभार! ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ साथ एक वित्तीय कैलेण्डर भे तो चलता है अपने देश में जब हम पूरे वर्ष का लेखा जोखा मौद्रिक अधर पर करते हैं. कुछ नया करने का संकल्प सही है ...आज विभिन्न मंदिरों में भी भीड़ देखा गया पिकनिक स्पॉट पर तो आज मेला ही लगा है शाम तक कितनी दुर्घटनाएं हुई वह भी रिपोर्ट आ जायेगी. वासुदेव त्रिपाठी ने लिखा है खुशफहमी भी अच्छी चीज नहीं तो बुरी भी नहीं है. सादर! वो भगवान से साक्षात्कार वाला भी यहाँ उपलब्ध करा देते! आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जेन का आभास तो हो जाता.......

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

परम आदरणीय मुनीश जी, आप मेरे ब्लॉग पर आए और अपनी चिर-परिचित शैली में व्यंग्य बाण भी चलाए तथा सरिता जी के आलेख का लिंक भी शेयर किया जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। आपको ये जानकर दुःख होगा कि मेरी नजर में सरिता जी उन स्त्रियों में शुमार होती हैं जिन्होंने मर्दों की गुलामी को ही नियति मान लिया है और इसीलिए 'निकलो न बेनकाब' की हिमायत करती हैं। हैरत होती है जब कोई स्त्री खुद ही अपने लिए परदे की तरफदारी करती हो लेकिन इसे दुर्भाग्य कहना ज्यादा सही है कि मर्दों के छ्द्मजाल को औरतों ने सच मान रखा है। क्या कर सकते हम ऐसी स्त्रियों के लिए, कैसे उन्हें इस भ्रम से मुक्त कराएं ताकि परंपरा, प्राकृतिक संरचना और संस्कृति सरंक्षण के नाम पर आए दिन होने वाले मर्दों के अत्याचार से उन्हें मुक्ति मिल सके। इससे भी ज्यादा चिंतनीय विषय यह है कि स्त्री समाज स्वयं को मर्द से अलग और स्वतंत्र अस्तित्व का कैसे समझे? आशा है हमारे ये बात आपको जरूर सोचने को विवश करेगी क्योंकि आप खुद भी स्त्री को गुलाम समझने की मानसिकता से ग्रसित हैं। धन्यवाद आपका

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

सचमुच बड़ी ईर्ष्या हो रही है आपसे, आपका उपवास वाला बकवास (बात) छोड़कर बाकी सभी बातें मेरे पसंद की है मेरा भाग्य भी कुछ आप के भाग्य जैसा ही है. मैं श्रीमती जी के रहते भूखा नहीं रह सकता ... कभी कभी मेरे मुंह से भी निकल जाता है कि मेरी श्रीमती जी का सामना अगर यमदूत से हो ही जाय तो वो कहेंगी - भैया थोड़े देर ठहर जाओ, कम से कम आज का नाश्ता खाना तो बना कर रख दूं इनके लिए, फिर ख़ुशी ख़ुशी आपके साथ चल पडूँगी. भगवान वो दिन न दिखाए पर आपकी श्रीमती जी और आप में बड़ा अच्छा सामंजस्य है चाहे वह करवा चौथ का दिन हो या फ़रवरी महीने के दूसरे सप्ताह की अवधि. सादर प्रणाम युगल जोड़ी को! दूरदर्शन में शुरुआत में एक सीरियल आती थी - तस्वीर का दूसरा रुख - अगर आपने वह सीरियल देखी होगी तो आप मेरा इशारा समझ गए होंगे .... पुन: प्रणाम!

के द्वारा:

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

आदरणीय सिंह साहब किसी भी समस्या का समाधान हिंसा नहीं हो सकता लेकिन अहिंसा के सिद्धांत को समझाने के लिए हिंसा भी जरूरी है जैसे भगत सिंह ने संसद में बम फोड़कर की थी, ये जरूरी भी है क्योंकि सत्ता आज भी अंधे गूंगे बहरे लोगों के हाथ में ही है जो न किसी कष्ट देखना चाहते हैं न सुनना चाहते हैं और न ही उस पर कुछ बोलना चाहते हैं. लेकिन बात ये है की जब नेता मरे तो लोकतंत्र पर हमला और प्रधानमन्त्री, सोनिया गांधी, राहुल गांधी सब के सब देखने चल दिए हॉस्पिटल में और अभी जब डेढ़ दो साल पहले इन्ही नक्सलियों ने ७५ सीआरपीऍफ़ के जवानों को मार दिया था तब तो कोई लोकतंत्र पर हमला नहीं हुआ न ही प्रधानमन्त्री को इतनी फुर्सत मिली को वो घायलों से मिल भी लेते. अब करैं न मृतकों के परिवार वालों को दो दो लाख, और घायलों के परिवार वालों को पचास पचास हज़ार देकर मामले को रफा दफा ........

के द्वारा: munish munish

आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! आपकी सारी बातें तर्कसंगत है ...निदान ढूँढा जाना चाहिए, बात चीत से या विकास का मार्ग खोलकर सबको सामान सुविधा मुहैया कराकर! आज भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी सुविधाओं की घोर कमी है, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी है. निश्चित ही इन पर सभी राजनीतिक दल को एक मत होकर समाधान के रस्ते ढूंढें जाने चाहिए. आईपीएल और अन्य जश्नों में पानी की तरह पैसा बहाया जाता है ...जबकि दूसरी जगहों में पीने का पानी भी नहीं मुहैया कराई जाती तो विष्फोट तो होना ही था. पर नक्सली का इस प्रकार का या उस प्रकार का खूनी खेल किसी भी तरीके से जायज नहीं कहा जा सकता! .....आप भी इस बात को मान रहे हैं. केवल लोकतंत्र पर हमले वाले जुमले से आप नाराज हैं. ऐसा प्रतीत होता है! सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

प्रभु प्रसन्न हो गए हम पुनः जिन्दा हो गए अब ऐसी कवितायें लिख रहे हैं जिन्हें पढ़कर पाठक ऊपर उठ रहे हैं पाठक ऊपर यानी स्वर्ग की तरफ उठ रहे हैं. वहां से ही इंतज़ार करेंगे, कब मुनीश बाबू की आत्मा ऊपर आयेगी हम सभी मरे लोगों को अपनी कविता सुना अमरत्व प्रदान करेगी! बोझ तो उठाना ही पड़ेगा, चाहे अटैची हो या सूटकेस! ऐसी कविता पढ़कर अगर इंसान हँसते हँसते मर जाय तो भला कौन लडेगा उनका केस ? आदरनीय प्रभु, अस्वर्गीय मुनीश बाबू, जरा ये हुनर हमें भी सिखाइए ! मरना ही है तो हंसते हंसते मरना सिखाईये ! वैसे भी हम सब कौन जिन्दा हैं! अपने ही कुकर्मों पर शर्मिंदा हैं! हम तो श्रम से ही मर जाने वाले हैं और वे शर्म को धो धोकर पीनेवाले है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

क्या साबित करना चाहती है सरकार इस प्रकरण से ये तो सरकार बहतर समझ सकती है लेकिन उन अभियुक्तों को 2011 में छोड़ दिया गया जो प्रारम्भिक जांच में दोषी पाए गए और उन्होंने विस्फोटों में अपनी संलिप्तता स्वीकार भी की थी। इसी प्रकार समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के आरोपी सफ़दर नागौरी को भी छोड़ दिया गया जिसके विषय में लश्कर आतंकवादी डेविड हेडली ने बताया और नार्को टेस्ट में स्वीकार भी किया गया और पकड़ लिया स्वामी असीमानंद को। उक्त अभियुक्तों को 2011 में जमानत पर छोड़ा गया और एनआईए ने अदालत में जमानत अर्जी का विरोध नहीं किया।सब कुछ वोट पाने का जुगाड़ है मुनीश जी लेकिन ये सोच हिंदुस्तान के लिए बहुत सार्थक तो नहीं कही जा सकती !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मेरा ऐसा मानना है की 20000 करोड़ के नुक्सान से यदि कुछ सार्थक निकल कर आता है तो बुरा क्या है जब ये राष्ट्र 176000 करोड़ का कॉमनवेल्थ झेल सकता है, 180000 2जी झेल सकता है, 200000 करोड़ का कोयला जला सकता है 350 करोड़ के हेलीकाप्टर उड़ा सकता है, 4100000 करोड़ का काला धन देश के बाहर भेज सकता है तो 20000 करोड़ का ये दंड भी झेल सकता है यदि कुछ सकारात्मक निकला तो ये कीमत बुरी भी नहीं। आपने ऊपर ये भी लिखा है की ये सरकार अंग्रेजों की वाही सरकार सी लगती है जिसके लिए भगत सिंह ने बम फैंका था ! आपको संदेह लगता है श्री मुनीश जी ? मुझे नहीं ! आज जब सरकार इतनी महंगाई बढ़ा चुकी है तब ये जरुरी हो जाता है की आम जन अपना गुस्सा दिखाए ! लेकिन आमजन का ये गुस्सा कभी कभी गलत दिशा में चला जाता है ! ठीक बात है , हम जापान नहीं बन सकते लेकिन हम हिंदुस्तानी तो हैं , हमें एक हिंदुस्तानी की तरह ही रियेक्ट करना पड़ेगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! आत्म हत्या के बहाने आपने जो अपनी आप बीती सुनायी, मैं तो थोड़ा समझा, थोड़ी अपनी बीवी को भी समझाई, मेरी बीवी तो मुझसे ज्यादा समझदार निकली ... कहने लगी, "अगर तुम्हे भी मुनीश जी जैसा मरना है, तो याद रखना ऐसा कुछ करने से पहले महीने भर का राशन रख जाना बीमा की पोलिसी कहाँ रखे हो बताकर जाना! ऐसे भी, हर महीने के आखिरी में जेब खर्च मुझसे ही मांगते हो! पता नहीं, दिन भर ऑफिस में क्या झख मारते हो! मेरी तो सिट्टी पिट्टी हो गयी गुम क्या इसी दिन के लिए पत्नी से प्यार करते थे हम! इस जहाँ के नौनिहालों! जरा इस कविता को पढो और खुद को सम्हालो यूं आत्म हत्या का ख्याल भी दिल में न पालो अगर मन में कुछ है तो किसी के सामने कह डालो! पुन; प्रणाम करता हूँ, हे महोदय आपकी कविता हमें बहुत कुछ सिखा गयी नित्य आत्महत्या की ख़बरें पैदा करने वाले नौनिहाल! इसे जरूर पढ़ें और इस कविता से, यानी आपकी कविता से सबक लें..... जीवन तो सुख और दुःख के बीच ही पलता है ज्यादा खुशी होने से अपनों का ही दिल जलता है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय मुनीश जी, सादर ! ""मेरा ऐसा मानना है की 20000 करोड़ के नुक्सान से यदि कुछ सार्थक निकल कर आता है तो बुरा क्या है जब ये राष्ट्र 176000 करोड़ का कॉमनवेल्थ झेल सकता है, 180000 2जी झेल सकता है, 200000 करोड़ का कोयला जला सकता है 350 करोड़ के हेलीकाप्टर उड़ा सकता है, 4100000 करोड़ का काला धन देश के बाहर भेज सकता है तो 20000 करोड़ का ये दंड भी झेल सकता है यदि कुछ सकारात्मक निकला तो ये कीमत बुरी भी नहीं।"" बिलकुल सच्ची बात ! पिछले कई माह से यूनियनों और सरकार की बात हो रही है, पर सरकार "देख रहे हैं, देखेंगे और देखते रहेंगे" की अपनी पुरानी निति पर चल रही है ! वास्तव में अब इस लोकतंत्र को एक गंभीर सर्जरी की जरुरत है ! जो जनता ही करेगी ! वह भी बिना बेहोश किये ! बस समय निर्धारित नहीं है ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: munish munish

आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! तथ्य कई हैं पर सत्य एक है. आप की ही उक्ति के साथ मेरा विनम्र निवेदन है कि क्या इस घोर अराजकता के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं?... हमने ही उन्हें बार बार जिता कर सत्तासीन नहीं किया है? आज भी विरोध बहुत हो रहा है, ममता ने अपने हाथ खींच लिए, डी एम के अल्टीमेटम देती है... शरद पवार समर्थन नहीं हटाते, लालू, माया और मुलायम हाथ को मजबूत करते हैं. क्यों भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ नहीं जीतती? हम क्यों मतदान के दिन अपनी उंगली को हाथ का साथ देने पर मजबूर हो जाते हैं. क्यों हमारे जन प्रतिनिधि बिक जाते हैं? कहीं न कहीं हम भी जिम्मेवार हैं????? .... आज मैं कसम खाता हूँ कि कांग्रेस को वोट नहीं दूंगा भाजपा को ही वोट दूंगा या उसकी सहयोगी पार्टी को.... बाकी लोग भी कसम खाएं और मतदान के दिन तक याद रखें! हमेशा शिक्षित वर्ग ही वोट के दिन छुट्टी मनाता है ...जबकि गरीब लोग हर परिस्थिति में वोट देने जाते हैं! मुनीश बाबु, एक समय था जब कलम से क्रांति आती थी ...आज कलम की ताकत कमजोर हो गयी है ... सोसल साइट्स पर, जंतर मंतर पर, सड़कों पर इतना जन विरोध हो रहा है फिर भी सरकार के कानों पर जूँ नहीं रेंग रही है ...क्यों????

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: munish munish

''वही पढने लिखने का शौक था, वही लिखने पढ़ने का शौक है, तेरा नाम लिखना किताब पे , तेरा नाम पढ़ना किताब में'' _बशीर बद्र.... !!!! लेकिन आज मैं अपने शौक से हट कर कुछ आपका लिखा हुआ भी पढ़ा, पुराने दिनों की याद ताज़ा हो गई, बाल-हंस, चंपक, नन्हे सम्राट की यादें फिर से हरी हो गईं .....!!!! लेकिन साहेब आपने अपनी लेख में वही कहा है जो आपको कहना था, पर जो कहा जाना चाहिए या फिर जिसे कहने की ज़रुरत है वो तो आपने कहीं कहा नहीं.... अपने लिए लिखना या फिर अपनी बातों को सुना देना बहुत आसान है.... इस देश की प्रतिभा भीड़ की गुलाम हो गई है, हम लोगों को वही सुना रहे हैं जो लोग सुनना चाहते हैं..... या फिर यूँ हो सकता है की हमारी समझ भी लोगों की समझ से कुछ अलग नहीं है, मुझे तो बीमार और चिकित्सक में कोई भेद नहीं दिखता है...( I might have used 'we'/ they at my suvidha but take it for 'you' only...I have got nothing to do with 'he/she/it/they/ or we,).. (You may think why I suddenly came to read and comment on you post, a friend of mine especially requested me to read your post, she loves your kind of lekh. Having read, I was mazboor enough to comment, so i had to bare my heart :) :) :) Good Night.)

के द्वारा: Sandeep Kumar Sandeep Kumar

के द्वारा: munish munish

श्री मुनीश जी सादर नमस्कार  और नमस्कार आपकी कलम को  जिसने इतने सुन्दर शब्दों में समय की सर्वाधिक चिन्ता युक्त बात का वर्णन किया है।सरकार,नागरिक व जन प्रतिनिधि सभी भृष्टाचार में लिप्त हैं लोग विरोध तो कर रहैं हैं लैकिन विरोध करने बाले भी सभी कहाँ दूध के धुले हैं हो सकता है बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के साथ बहुत से लोग सच्चे व ईमान दार हों किन्त मैने बहुत से एसे सर्वाधिक भृष्टों को भी इन आन्दोलनों के जरिये अपना नाम करते देखा है यह सही है कि बुरा देखना गलत है पर समस्या यह है कि जो लोग इन आन्दोलनों मे साथ है वही भृष्टाचारियों का या तो लालन पालन कर रहे हैं या फिर खुद ही एसे धन्धों मे व्यस्त हैं। आपकी लेखनी ऐसे ही लोगों पर चली है। जहाँ दुष्कर्मों का इतना भयंकर दण्ड दिया गया हो वहाँ की आने वाली पीड़ी उससे भी भयंकर पापों में रत हो जाए यह सचमुच सोचने की ही बात नही अपितु कुछ ठोस कदम उठाने की जरुरत है।

के द्वारा: Gyanesh Kumar Varshney Gyanesh Kumar Varshney

के द्वारा: satish3840 satish3840

जैसे मैं करता हूँ या माननीय प्रधानमंत्रीजी करते हैं. मुफ्त में मिली सीट का, इतनी इज्ज़त बक्श रहे हैं सीट को की अपनी इज्ज़त की भी फिक्र नहीं, लोग चाहे उन पर कितनी ही तोहमत लगाएं वो फ्री में मिली सीट की कद्र करना कैसे छोड़ दें. ” श्रीमती जी ” हमारी ओर तनिक भी ध्यान न देतीं दिन भर सास – ससुर, देवर ननद की खिदमत में और घर के कामों में समय निकाल देतीं जैसे "सारे कोंग्रेसी" "सोनिया जी" की खिदमत में लगे रहते हैं……. सोचता हूँ, मैं भी इन वाक्यों को सम्हाल कर रख लूं! आखिर 'मुफ्त' में ही तो पढने को मिली है... आदरणीय मुनीश बाबु, सादर प्रणाम! "कुछ तो खास है" सोनिया जी में तभी तो सभी उनका ख्याल रखते है और वह पूरे देश का ख्याल रखतीं हैं..... नहीं????

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: jlsingh jlsingh

तभी एकाएक रावण के छुपे हुए दसों सिर निकल आये बीसों भुजाएं निकल आयीं…………… वो आक्रोश में बोला…….. ! नहीं मेघनाद ……. अब रावण राज नहीं…….. रहने दो इन भारतीयों को इनके ही हाल पर ये इसी लायक हैं …….! हम ने मरते समय राम की शरण ली थी ………….! हम राम के साथ धोखा नहीं कर सकते ……… परन्तु ये लंकेश्वर रावण का इन भारतवासियों को श्राप देता है की जब तक ये स्वयं आगे बढ़कर स्त्रीजाति का सम्मान करना शुरू नहीं करेंगे, राम के आदर्शों पर नहीं चलेंगे तब तक कोई राम इन की सहायता के लिए नहीं आएगा …………. ! जितने ये हमारे पुतले जलाएंगे उतनी ही अराजकता फैलेगी……….. जब तक ये अपने अन्दर के रावण अपने से दूर नहीं करेंगे ……… तब तक सदां रावण से हारते रहेंगे …..हाहाहा …..हाहाहा …… तब तक ये सदा रावण से हारते रहेंगे ………राम तो आज भी हैं श्री मुनीश जी , किन्तु रावण संख्या में ज्यादा हैं इसलिए राम स्वयं रावण की संख्या देख कर डरे हुए हैं ! बहुत बढ़िया और सार्थक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: munish munish

धानमन्त्री जी के अनुसार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भारत की गरीब जनता को फायदा होगा लगभग वैसा ही जैसा मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने ईस्ट इण्डिया कंपनी को व्यापार करने की छूट दी थी और उस कंपनी ने भारत को फायदा पहुंचाया, नाम तक भारत के स्थान पर इण्डिया कर दिया आज भी विश्व में हम भारत के नहीं इण्डिया के नाम से जाने जाते हैं आगे शायद वालमार्ट या कोई और नाम हमारे देश का हो सकता इस से क्या फरक पड़ता है उस समय तो भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था तो एक कंपनी ने ही भिखारी बना दिया तो आगे का पता नहीं, मैं विदेशी निवेश का स्वागत करता यदि वो कम्पनियां १०० प्रतिशत भारत से ही खरीदें और लाभ को यहाँ के ही विकास में लगाएं, जाहिर है वो ऐसा करेंगी नहीं क्योंकि उनका उद्देश्य लाभ कमाना है समाज सेवा नहीं आपने शुरू में ही एक सवाल उठा दिया है " क्या सच में मनमोहन सिंह भारत के ही प्रधानमंत्री हैं ? सब कुछ कह दिया आपने इस एक वाक्य में !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: munish munish

आदरणीय राजनभीम जी, स्वागत है ब्लॉग पर, आपने सिक्के के दुसरे पहलू के विषय में लिखा परन्तु साथ ही ये नहीं लिखा की जब तीन हज़ार साल पहले या उस से भी पूर्व परिस्थितियाँ तो सभी के लिए सामान थीं तो फिर टिड्डा चींटी जैसे छोटे से जीव से कैसे पीछे रह गया ....... ! सिर्फ मेहनत के कारण चींटियों ने मेहनत की और अपनी मेहनत का फल पाया क्या शुरुआत में जब प्राकर्तिक रूप से सभी के पास सामान अवसर थे तो किसी ने टिड्डे को कहा था की वो गाना गाता रहे और चींटियाँ मेहनत करतीं रहें चींटियों ने मेहनत करके टिड्डों से अपने को ऊंचा उठाया, और आज भी स्थिति ज्यों की त्यों हैं जो टिड्डे मेहनत नहीं कर सकते वो आरक्षण की वकालत करते हैं, और रही बात अमेरिकी गोरी चींटियों की तो वो भी भारतीय चींटियों के बराबर मेहनत नहीं कर प् रहीं तो हताशा में गोलियां चला रहीं हैं अगर टिड्डों और गोरी चींटियों ने मुकाबला ही करना है तो भारतीय चींटियों के बराबर मेहनत तो कर के दिखाएँ,......... और रही बात टिड्डों द्वारा भारत को विकसित बनाने की तो अब तो गोरी चींटियों के आकाओं ने स्वयं ही कह दिया की ये भारत के पढ़े लिखे टिड्डों की क्वालिटी चींटियों के मुकाबले की नहीं है इसलिए टिड्डों से घबराने की ज़रुरत नहीं वो कुछ नहीं बिगाड़ सकते अब न अमेरिका को भारत से दर हैं न भारतीय टिड्डों से

के द्वारा: munish munish

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जिस प्रकार सिक्के के दो पहलू होते हैं ठीक उसी प्रकार इस कहानी के भी दो पहलू हैं|पहला पहलू इस प्रकार है- सन १९४७ से पूर्व ३००० हज़ार सालों चीटियों ने खूब खाया पिया भोजन जमा किया|चीटियों ने अपने ज़हर रूपी कानून एवं नियम बनाये और उनको टिड्डों पर जबरदस्ती थोप दिया|टिड्डों को आगे नहीं बढ़ने दिया और उनका हिस्सा छीनकर जमकर खाया|जिन टिड्डों ने इसका विरोध करना चाहा उनको अपने ज़हर रूपी सामाजिक नियम कानून से मार डाला और उनकी लाशों को चीटियाँ झुण्ड बना के अपने धारदार दांतों से सफाचट करके खा गई| टिड्डे आलसी नहीं वरन चीटियों के ढोंग एवं दबाव में मुर्ख एवं विवेकशून्य बनके रह गए| अपना एवं समाज का विकास भी नहीं कर पाये|जो टिड्डे अपने दम पर मेहनत करना चाहते उनको चीटियाँ मार कर उनकी लाश को झुण्ड में दावत बना कर साफ़ कर देती और टिड्डों का हक़ मार लेती| फिर धीरे-२ समय बदला टिड्डों ने ज्ञान प्राप्त करना शुरू किया|जब टिड्डों को अपनी क्षमताओ का ज्ञान हुआ तो उन्होने अपने एवं समाज के विकास के लिए इन ३००० हज़ार सालों के चीटियों के आत्याचारो का हर्जाना आरक्षण के रूप में माँगा ताकि टिड्डे भी चीटियों के साथ मिलकर बराबर रूप से समाज का विकास कर सके लेकिन नहीं इन चीटियों को अपनी सत्ता खोने का डर सताने लगा|लेकिन थक हार कर चीटियों को हर्जाना देना ही पड़ा| जब चीटियों को लगा के भारत में उनके लिए कुछ भी नहीं बचा तो चीटियाँ पीठ दिखा कर और भारत को बर्बाद करके पहले से ही विकसित देश अमेरिका भाग गई और वहां की गोरी चीटियों और टिड्डों के टुकड़ों पे पल के उनका हक़ मारने लगी|अब अमेरिका की गोरी चीटियों में भी भारत के टिड्डों की ही तरह क्रान्ति की भावना जगी तो अक्सर ही अमेरिका में भारतीय चीटियों को अमेरिका की चीटियाँ सरेआम गोलियों से भूनती रहती है|भारतीय चीटियों की वजह से अमेरिका भी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है|अब जब भारतीय टिड्डे भारत को फिर से विकसित बानाएंगे तो ये चीटियाँ अमेरिका से भगा दी जायेंगी फिर भारत आ जाएँगी यहाँ के टिड्डों का हक़ मारेंगी|

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आदरणीय मुनीश बाबु, सादर अभिवादन! हरकोई मरकर भी धरती पर ही रह जाता !! इसीलिए, तो धरती पर जनसँख्या बढ़ रही है लोगों में, धोखाधड़ी और लूटपाट बढ़ रही है !! धरती पर, लोगों के दुखों का कोई समाधान नहीं है ! क्योंकि लोगों की “आत्मायें” तो कब की मर चुकी हैं !! आपकी इन सारगर्भित कविताओं से मैं कैसे वंचित रह जाता हूँ! आपका जनमंच मेरे मेल पर स्वत: आ जाता है फिर भी मुझे दुःख है कि मैं इसे पढ़ा तो कई दिन पहले था नेटवर्क की समस्या की वजह से आज पर्तिक्रिया ब्यक्त कर रहा हूँ. कृपया जागरण मंच पर भी बीच बीच में अपनी झलक दिखलाते रहें. आपके बेबाक विचार, व्यंग्य, कविताये सब में एक अनूठा रस होता है जिसे पढने के बाद तृप्ति तो नहीं होती प्यास और बढ़ जाती है. लिंक साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

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के द्वारा: Ajay Kumar Dubey Ajay Kumar Dubey

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मित्रवर मुनीश जी , अपरिहार्य निजी कार्यो से में मंच से अनुपस्थित था और आपके विचारों का उत्तर नहीं दे पाया , यंहा मे आपक दो सवालों का सपस्थ्करण दे रहा हूँ ,सायद आप इससे सहमती जाता पाए , पर यदि नहीं तो भी आपके विचारों का भी सम्मान , आपक अपने नजरिय से सही मुझे अपने नजरिय पआर रह आपसी प्रेम को BANAYE रहने दे ! =------------------------- धर्म कोई भी हो वह सभी के सद्भाव उत्थान प्रेमभाव की बात कहता है ,कोई धरम अत्याचार ,दुराचार ,आतंक को सही नहीं ठहराता ,उसकी नजर में सब समान है ======== जिस तरह अलाह या राम एक है उसी तरह जितने चाहे धरम मान लो सब धरम का मूल एक है , ———— हमारे देश में सभी संगठनों ,व्यक्ति ,संस्था को अपनी बात एक निश्चित दायरे या विरोध का एक सवेधानिक तरीका है , पर कोई भी व्यक्ति इस सीमा को लान्खता है तो उस पर अंकुश लगाना अनिवार्य है , और यदि उसकी प्रामिन्कता के सबूत हमारी न्याय प्रणाली उपयुक्त मानती है तो जरुर कारवाई होनी चाहिय , पर जिन संस्था का लेख में वर्णन है उनकी भाषा ,आचरण ,संवाद में एक सार्वजानिक अभिव्यक्ति का और राष्ट्रिय एकता पर प्रहार का दोष पाया गया है ! सायद आप इसे ना नकारे !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

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मुनीश भाई, नमस्कार सबसे पहले तो एक प्रश्न की कहाँ गम हो गएँ थे आप.............. सुन्दर कहानी मजेदार और जोरदार भी..............टिड्डों में एक गुण जरुर होगा की वो वोट एक सुर में देते होंगे..............और दूसरी बात महिला टिड्डों के लिए अतिरिक्त स्थान का प्रबंध नहीं करवाया आपने..........................किन्तु आपके अंत से मुझे पीड़ा हुई ...........यह कोई समाधान नहीं हुआ हम अपने देश को छोड़ पलायन कर जाय यह कैसी बात हुई.............अरे पलायन तो वह करते है जो निजी बेहतर भविष्य के कामना मन ही जीते हिया...........उनका पलायन ही करना उचित हिया..........असल में इस अरक्षण के विरुद्ध भी कुछ होना चाहिए....................नहीं तो हाथ में झुनझुना भी नहीं बचेगा बहोत सुन्दर कहानी पढ़ कर मजा आ गया

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

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वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार.....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आदरणीय कुशवाहा सर, कोंग्रेस छोड़ने का कारण तो आदरणीय दिनेश जी ने बता ही दिया, आदरणीय दिनेश जी, आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया, मैंने गांधी जी सुभाष को जानबूझकर एक साथ रखा, हालांकि मेरा उदेश्य कुछ विवाद पैदा करना नहीं है..... वास्तव में दोनों का ध्येय एक ही था और अगर किसी को कोई गलती हो भी गयी तो उसके कर्म की उपयोगिता कम नहीं हो जाती और आत्माएं तो वैसे इन सब से ऊपर निकल जाती हैं, इसीलिए में इन दोनों को एक साथ कार्य करता हुआ दिखाना चाहता था भले ही एक समय ये दोनों अपनी अपनी नीतियों और विचारों के कारण अलग रहे हों, बहरहाल अभी आगे देखिये क्या होता है ........! आप दोनों को मेरा अभिवादन

के द्वारा: munish munish

प्रदीप जी, गाँधी जी ने नेता जी के विरोध में सीता रमैया को काँग्रेस अध्यक्ष  पद के लिये खड़ा किया था। जिसमें नेता जी भारी बहुमत से विजय हुये थे। इससे गाँधी जी को अपने अस्तित्व हीन होने का खतरा लगने लगा था। गाँधी जी से घोषणा कर दी कि यह सीता रमैया की हार नहीं है अपितु मेरी हार है और यदि सुभाष चन्द्र बोस काँग्रेस अध्यक्ष पद पर रहे तो मैं राजनीति से संन्यास लें लूँगा। यह सुनते ही सुभाष चन्द्र बोस ने काँग्रेस के अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दे दिया। गाँधी जी ने नेता जी को काँग्रेस छोड़ने के लिये भी मजबूर कर दिया। अतः नेता जी ने काँग्रेस छोड़कर फारवर्ड ब्लॉग नाम से नई पार्टी बना ली।     मुनीष जी ऐसा लगता है कि नेताजी के आँसुओं से लिखी गई रचना हो, क्राँति की आग की तरह धधकती हुई रचना को नमन।    लेकिन नेता जी के साथ बापू का होना विस्मित कर गया। और काँग्रेस तो  बापू की ही तुष्टिकरण की नीति पर चल रही है।

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के द्वारा: munish munish

आदरणीय नौटियाल साहब स्वागत है आपका जनमंच पर अब आपने भी न समझी दिखाई .........! :) सरकारी निति है अपने पैसे सम्हाल कर रखो या विदेश में जमा करो जिस से विदेशियों को लगे की हम अमीर हैं और फिर उनसे कर्जा लेकर काम करो ........ ! अब आप तो जानते ही होंगे की बैंक भी क्रेडिट वर्थ देखकर ही लोन देते हैं इसीलिए सरकार टैक्स लगाकर हमसे पैसे इकट्ठे करती है और घोटाला करके विदेशियों की नजर में अपनी क्रेडिट वर्थ बढ़ाती है और वर्ल्ड बैंक से भी पैसे ले लेती है......! समझे सरकारी निति अरे निति बिलकुल साफ़ है की वर्ल्ड बैंक से इतना लोन लो की बैंक ही खाली कर दो और बाद में ज़रुरत पड़ने पर उसी को ज्यादा ब्याज पर दे दो ........! अभी तो सरकारी निति का पहला चरण है बाद में आप सब समझ जायेंगे.....! :)

के द्वारा: munish munish

"...अब पाकिस्तान पर कुछ काम-धाम तो है नहीं तो वो दुसरे देशों के लोगों को बहकाता रहता है…… ! और हमारे यहाँ व्यक्ति ठहरे कर्मप्रधान, भगवदगीता में कहा भी गया है कर्म करो फल की चिंता मत करो……! इसलिए यहाँ के लोग कार्य करते समय केवल कर्म को ही महत्त्व देते हैं और ये आचार, विचार, भ्रष्टाचार पर ध्यान नहीं देते. अब वो नकारा लोग जो काम धाम तो कुछ करते नहीं और न ही उनके बसकी कुछ काम करना वो शोर करने लगते हैं भ्रष्टाचार - भ्रष्टाचार. मुझे तो ऐसे लोगों के पीछे पाकिस्तानी षड्यंत्र की बू आती है. " बहुत खूब लिखा मज़ा आ गया | समस्या यह यह है कि सरकारी तंत्र दो दो तरफ से चूना लगा रहा है देश को | सरकारी योजनाओं को चलाने के लिए टैक्स लगा देते हैं वर्ल्ड बैंक से न जाने किस बात का उधार ले लिया है | यदि सारा पैसा वर्ल्ड बैंक दे ही रहा है तो देश की जनता से टैक्स वसूली क्यों ? और टैक्स ही वसूलना है तो फिर काहे वर्ल्ड बैंक के आगे झोली फैलाए हुए हैं ? क्या इस में घोटाला नहीं है ?

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मुनीश जी, आज ही मौक़ा निकाल कर मैंने आपका लेख पढ़ा, आपने एक सार्थक वस्तु को इतने छोटे लेख में इतने पुरजोर ढंग से रखा है की मैं आपकी प्रतिभा पे हैरान हूँ. सबसे बड़ी बात है की आपने इसमें कई चीजों को दरसाया है पहली हमारी कमजोर सरकार जो तमाम नाकामियों के बाओजूद सत्ता में आ जाती है दुसरा हमारा आराक्षण तंत्र सुरु से ले के आज तक और किस कदर ये बढ़ रहा है इससे भी आपने दरसाया है और भी काफी चीजें है इस लेख में की कैसी एक यौग्य व्यक्ति राजा नहीं बन पा रहा और अयोग्य ऊपर चढ़ता जा रहा है बहुत कुछ कहने लायक है आपका लेख पर मैं और क्या बोलू बस यही कहूंगा की लोग इससे पूरा पढ़े ना की आधा वरना इस्सका पूरा मजा नहीं ले पायेंगे अपार शुभकामनाओं के साथ आपको इस जोरदार लेख के लिए तहे दिल से बधाई

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

मुनीश जी, आपका लेख 'गुजरात दंगे और सरकारी आकड़े' पढ़ा. जिसे पढ़कर पुराने जख्म ताजें हो गएँ. मैं 'गुजरात दंगों' के पक्ष में नहीं हूँ क्योंकि चाहें हिन्दू मारें गएँ हो या मुस्लिम, हानि तो मानवीय मूल्यों की हुई है. कौन-क्या कहता है यह हकीकत आप भी जानतें है और मैं भी. इसलिए किसी विशेष समुदाय को दोष देने से बेहतर होगा कि इन घटनाओं से कुछ सीखें ताकि आने वाले दिनों में इसकी पुनरावृति न हो. गड़े मुर्दें...जहाँ तक कुशुर्वर कि सजे की बात है तो मुझे नहीं लगता की कभी ऐसे केसों में कुसूरवार को सजा मिलती है. हमेशा बेकुसूर और आम जनता ही सजा पाती हैं. आग लगाने वालें कहीं दूर बैठकर अपना हाथ सेकने में लगे होतें हैं.

के द्वारा: अलीन अलीन

के द्वारा: munish munish

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मुनीष जी सादर नमस्कार, यदि सचमुच आपकी इस समिति का निर्माण हो गया तो हमारे देश को अनेकानेक समस्याओं से मुक्ति मिल जायगी। बेरोजगार युवकों को रोजगार मिल जायगा। इससे सरकार को बेरोजगारी के बारे में सोचने की जरूरत नहीं पड़गी। जूते आदि की माँग बढ़ जाने के कारण देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो जायगी।  इससे हमारा लोकतंत्र भी मजबूत होगा। छोटे से छोटे आदमी को अपनी बात कहने का अधिकार मिल जायगा।  मेरे विचार से इस समिति को राहुल के लोकपाल की तरह संवैधानिक दर्जा मिलना चाहिये। मुनीष जी यदि आपकी योजना अपने मकसद में कामयाब होती है, तो अगले वर्ष भारतरत्न की सूची में आपका नाम सबसे ऊपर होगा। लेकिन मैं आपकी एक बात से सहमत नहीं हूँ कि जूता, व्यक्ति या संगठन के लेबल के हिसाब से प्रयोग किये जायेंगे, क्योंकि इससे कालान्तर मे वर्ग  विभेद के कारण वर्ग संघर्ष की समस्या उत्पन्न हो जायेगी। निःसंदेह आप मुझे मनमोहन जी से बड़े अर्थशास्त्री लगते हैं।आपकी समिति को मेरा पूरा समर्थन। भाई जब भी बनाओ, मुझे सूचित जरूर करना। अंत में आपकी रचना बहुत पसंद आई, इसलिये थोड़ा बोर कर देने वाली प्रतिक्रिया लिख दी है। कृपया इसे भी पढ़े- क्या यही गणतंत्र है http://dineshaastik.jagranjunction.com/

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय सरिता जी, अब आपको संगठन में नहीं शामिल होना है तो मत होइए हम मानते हैं की जूता मारना भी हर एक के बस की बात नहीं है ....... इसलिए हम आपसे ज़बरदस्ती भी नहीं करेंगे ........ पर ये क्या बात हुई की पंडितजी उसका तो नाम बता रहे हैं जो द्वारे आया ही नहीं और जो "जजमान" द्वार पर करबद्ध खड़ा है उसे नाम सुझाते नहीं. रही उँगलियों की बात तो ये तर्क भी व्वास्तव में उन भ्रष्टाचारियों का ही दिया हुआ है की चार उंगलियाँ तुम्हारी अपनी तरफ हैं इसलिए तुम ऊँगली मत उठाओ अब आप भारतीय उन दुष्टों के झांसे में आ गए और गलत की तरफ ऊँगली उठानी बंद कर दी.... क्योंकि लोग समझने लगे की चार ऊँगली हमारी तरफ हैं तो हम गलत को गलत नहीं कह सकते .......... इसी तर्क - कुतर्क को ख़त्म करने के लिए जूता फेंकना शुरू किया है......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया....... आशा है की अब कुछ समर्थन मिलेगा........ यदि तन मन से नहीं देना चाहतीं तो कुछ जूते ही भिजवा दीजियेगा संगठन के नाम ... :)

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मुनीश जी हम सब आपके साथ हें / वाकई कमाल का आइडिया हे /जूता मार संगठन की वाकई देश में जरुरत हें आखिर आम आदमी ही क्यों जूते रगड़े / आप की बिर्गेड न केवल नेताओं पर अपना जूता साफ़ करेगी वरन दहेज़ लोभियों को भी जूते से रूबरू करायेगी / आखिर कब तक आम आदमी चांदी के जूते मारेंगे / आपके जूते की बिर्गेड को ईराक के लोग भी काफी पसंद करेंगें /जूता ही काम की चीज है / आपको सच में बताऊँ मेरे बाबा जी खेत में जब धनिया बोते थे तो साबुत बी सूखे धनिये को बोने से पहले जूते से रगडा जाता हें / और आप यकीन मानिये उसी से हरे हरे धनिये के पोधे निकलते हें / आज यदि समाज में क्रांती लानी हें तो जैस्मिन क्रांती ( ट्यूनीशिया ) की तरह जूता क्रांती लाने की जरुरत हें / आखिर महिलायें न जाने इस अस्त्र शस्त्र का सदियों से अपने को छेड़े जाने से बचने के लिए अचूक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहीं हें / जूते की महिमा यों ही नहीं हें / जूते की माला ,जूते घिसना , जूते मारना ये सब मुहावरे यूँ ही नहीं बने / शादी में दुल्हे के जूते चुराई की रसम तो न जाने कब से चली आ रही हे / आज सही मोका हे जब जूते की सेकुलर तस्वीर का उपयोग कर कोमुनल फोर्सिज को हराया जा सकता हे / जूता अमीर , गरीब राजा रंक , फकीर सभी के पास हे / गरीब सुदामा भी क्रिशन जी से जूते पहन कर ही मिलने गया था /जूते की महत्ता आप समय से पहले समझ आम जनता को एक मकसद दे दिया / जूता दान महा दान ,जूता खावो , सत्ता पावो / आपका जूता अभियान दिन दूना रात चोगुना तरक्की करे / पर संभल कर , पुलिस को भी अब जूते चप्पल से नेताओं को बचाने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है / इस लिए जूता बिर्गेड को रिफ्रेशर कोर्ष अवश्य कराइए / http://satish3840.jagranjunction.com

के द्वारा: satish3840 satish3840

मुनीश बाबु, नमस्कार! यह जूता जरा सा चलता फिरता नाम है. इसे पादुका में परिवर्तित करिए! चरणपादुका प्रक्षेप समिति मेरे और गजोधर भाई के तरफ से सुझाया गया नाम है, अब यह आपके समिति के सदस्यों पर निर्भर करता है कि इसे स्वीकारें या स्थाई समिति में विचारार्थ भेज दे! मैं और गजोधर दोनों ही आपकी समिति में सक्रिय सदस्य बनना चाहते हैं. इसके दो फायदे हैं. एक यह कि हम दोनों के जूते एक ही साइज़ के और लोकल मेड हैं इसलिए सस्ते भी हैं. हमलोग दोनों ही जोर जोर से कहेंगे कि जूता हमने फेका है, अब पुलिस भी कंफ्यूज हो जायेगी कि गिरफ्तार किसे करना है. दूसरा कि कभी कभी हमलोग दूसरों के जूते जो मंदिर आदि के बाहर उतारे मिलते हैं उसे भी पहन लेते हैं इससे और कंफ्यूजन होगी कि जूता फेकने वाला या फेकवाने वाला दरअसल कौन है ? फिर जांच समिति और जाँच आयोग..... तबतक तो पांच साल निकल ही जायेंगे! ...... बहुत उपकार होगा अगर आप हमदोनो को ही अपनी समिति में शामिल कर ले! कुछ त्रुटियाँ थी इसीलिये उन्हें सुधारकर पुन; जमा कर रहा हूँ.

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मुनीश बाबु, नमस्कार! यह जूता जरा सा चलता फिरता नाम है. इसे पादुका में परिवर्तित करिए! चरणपादुका प्रक्षेप समिति मेरे और गजोधर भाई के तरफ से सुझाया गे नाम है, अब यह आपके समिति के सदस्यों पर निर्भर करता है किइसे स्वीकारें या स्थाई समिति में विचारार्थ भेज दे! मैं और गजोधर दोनों ही आपकी समिति में सक्रिय सदस्य बनना चाहते हैं. इसके दो फायदे हैं. एक यह कि हम दोनों के जूते एक ही साइज़ के और लोकल मेड हैं इसलिए सस्ते भी हैं. हमलोग दोनों ही जोर जोर से कहेंगे कि जूता हमने फेका है, अब पुलिस भी कंफ्यूज हो जायेगी कि गिरफ्तार किसे करना है. कभी कभी हमलोग दूसरों के जूते जो मंदिर आदि के बाहर उतारे मिलते हैं उसे भी पहन लेते हैं इससे और कंफ्यूजन होगी कि जूता फेकने वाला या फेकवाने वाला दरअसल कौन? फिर जांच समिति और योग तबतक तो पञ्च साल निकल ही जायेंगे! ...... बहुत उपकार होगा अगर आप हमदोनो को ही अपनी समिति में शामिल कर ले!

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के द्वारा: munish munish