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JANMANCH

एक उत्कृष्ट बात जो शेर से सीखी जा सकती है वो ये है कि व्यक्ति जो कुछ भी करना चाहता है उसे पूरे दिल और ज़ोरदार प्रयास के साथ करे.

42 Posts

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munish


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जंगल में जंगलराज

Posted On: 3 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा हास्य - व्यंग में

57 Comments

लगाइए जूते-लगवाइये जूते : जूता मार संगठन

Posted On: 24 Jan, 2012  
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हास्य - व्यंग में

34 Comments

तुलसी की जगह मनी प्लांट ने ले ली

Posted On: 24 Jan, 2012  
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कविता हास्य - व्यंग में

21 Comments

थप्पड़ की गूँज

Posted On: 25 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

32 Comments

भगत सिंह को फिर फाँसी

Posted On: 5 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

26 Comments

ऐ भाई, ज़रा देख के चलो………..!

Posted On: 31 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

19 Comments

पुरुषों सावधान….!

Posted On: 10 Oct, 2011  
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मस्ती मालगाड़ी हास्य - व्यंग में

26 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: munish

के द्वारा: Durgesh

मुनीश जी, आज ही मौक़ा निकाल कर मैंने आपका लेख पढ़ा, आपने एक सार्थक वस्तु को इतने छोटे लेख में इतने पुरजोर ढंग से रखा है की मैं आपकी प्रतिभा पे हैरान हूँ. सबसे बड़ी बात है की आपने इसमें कई चीजों को दरसाया है पहली हमारी कमजोर सरकार जो तमाम नाकामियों के बाओजूद सत्ता में आ जाती है दुसरा हमारा आराक्षण तंत्र सुरु से ले के आज तक और किस कदर ये बढ़ रहा है इससे भी आपने दरसाया है और भी काफी चीजें है इस लेख में की कैसी एक यौग्य व्यक्ति राजा नहीं बन पा रहा और अयोग्य ऊपर चढ़ता जा रहा है बहुत कुछ कहने लायक है आपका लेख पर मैं और क्या बोलू बस यही कहूंगा की लोग इससे पूरा पढ़े ना की आधा वरना इस्सका पूरा मजा नहीं ले पायेंगे अपार शुभकामनाओं के साथ आपको इस जोरदार लेख के लिए तहे दिल से बधाई

के द्वारा: ANAND PRAVIN

मुनीश जी, आपका लेख 'गुजरात दंगे और सरकारी आकड़े' पढ़ा. जिसे पढ़कर पुराने जख्म ताजें हो गएँ. मैं 'गुजरात दंगों' के पक्ष में नहीं हूँ क्योंकि चाहें हिन्दू मारें गएँ हो या मुस्लिम, हानि तो मानवीय मूल्यों की हुई है. कौन-क्या कहता है यह हकीकत आप भी जानतें है और मैं भी. इसलिए किसी विशेष समुदाय को दोष देने से बेहतर होगा कि इन घटनाओं से कुछ सीखें ताकि आने वाले दिनों में इसकी पुनरावृति न हो. गड़े मुर्दें...जहाँ तक कुशुर्वर कि सजे की बात है तो मुझे नहीं लगता की कभी ऐसे केसों में कुसूरवार को सजा मिलती है. हमेशा बेकुसूर और आम जनता ही सजा पाती हैं. आग लगाने वालें कहीं दूर बैठकर अपना हाथ सेकने में लगे होतें हैं.

के द्वारा: अलीन

मुनीष जी सादर नमस्कार, यदि सचमुच आपकी इस समिति का निर्माण हो गया तो हमारे देश को अनेकानेक समस्याओं से मुक्ति मिल जायगी। बेरोजगार युवकों को रोजगार मिल जायगा। इससे सरकार को बेरोजगारी के बारे में सोचने की जरूरत नहीं पड़गी। जूते आदि की माँग बढ़ जाने के कारण देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो जायगी।  इससे हमारा लोकतंत्र भी मजबूत होगा। छोटे से छोटे आदमी को अपनी बात कहने का अधिकार मिल जायगा।  मेरे विचार से इस समिति को राहुल के लोकपाल की तरह संवैधानिक दर्जा मिलना चाहिये। मुनीष जी यदि आपकी योजना अपने मकसद में कामयाब होती है, तो अगले वर्ष भारतरत्न की सूची में आपका नाम सबसे ऊपर होगा। लेकिन मैं आपकी एक बात से सहमत नहीं हूँ कि जूता, व्यक्ति या संगठन के लेबल के हिसाब से प्रयोग किये जायेंगे, क्योंकि इससे कालान्तर मे वर्ग  विभेद के कारण वर्ग संघर्ष की समस्या उत्पन्न हो जायेगी। निःसंदेह आप मुझे मनमोहन जी से बड़े अर्थशास्त्री लगते हैं।आपकी समिति को मेरा पूरा समर्थन। भाई जब भी बनाओ, मुझे सूचित जरूर करना। अंत में आपकी रचना बहुत पसंद आई, इसलिये थोड़ा बोर कर देने वाली प्रतिक्रिया लिख दी है। कृपया इसे भी पढ़े- क्या यही गणतंत्र है http://dineshaastik.jagranjunction.com/

के द्वारा: dineshaastik

आदरणीय सरिता जी, अब आपको संगठन में नहीं शामिल होना है तो मत होइए हम मानते हैं की जूता मारना भी हर एक के बस की बात नहीं है ....... इसलिए हम आपसे ज़बरदस्ती भी नहीं करेंगे ........ पर ये क्या बात हुई की पंडितजी उसका तो नाम बता रहे हैं जो द्वारे आया ही नहीं और जो "जजमान" द्वार पर करबद्ध खड़ा है उसे नाम सुझाते नहीं. रही उँगलियों की बात तो ये तर्क भी व्वास्तव में उन भ्रष्टाचारियों का ही दिया हुआ है की चार उंगलियाँ तुम्हारी अपनी तरफ हैं इसलिए तुम ऊँगली मत उठाओ अब आप भारतीय उन दुष्टों के झांसे में आ गए और गलत की तरफ ऊँगली उठानी बंद कर दी.... क्योंकि लोग समझने लगे की चार ऊँगली हमारी तरफ हैं तो हम गलत को गलत नहीं कह सकते .......... इसी तर्क - कुतर्क को ख़त्म करने के लिए जूता फेंकना शुरू किया है......... आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया....... आशा है की अब कुछ समर्थन मिलेगा........ यदि तन मन से नहीं देना चाहतीं तो कुछ जूते ही भिजवा दीजियेगा संगठन के नाम ... :)

के द्वारा: munish

मुनीश जी हम सब आपके साथ हें / वाकई कमाल का आइडिया हे /जूता मार संगठन की वाकई देश में जरुरत हें आखिर आम आदमी ही क्यों जूते रगड़े / आप की बिर्गेड न केवल नेताओं पर अपना जूता साफ़ करेगी वरन दहेज़ लोभियों को भी जूते से रूबरू करायेगी / आखिर कब तक आम आदमी चांदी के जूते मारेंगे / आपके जूते की बिर्गेड को ईराक के लोग भी काफी पसंद करेंगें /जूता ही काम की चीज है / आपको सच में बताऊँ मेरे बाबा जी खेत में जब धनिया बोते थे तो साबुत बी सूखे धनिये को बोने से पहले जूते से रगडा जाता हें / और आप यकीन मानिये उसी से हरे हरे धनिये के पोधे निकलते हें / आज यदि समाज में क्रांती लानी हें तो जैस्मिन क्रांती ( ट्यूनीशिया ) की तरह जूता क्रांती लाने की जरुरत हें / आखिर महिलायें न जाने इस अस्त्र शस्त्र का सदियों से अपने को छेड़े जाने से बचने के लिए अचूक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहीं हें / जूते की महिमा यों ही नहीं हें / जूते की माला ,जूते घिसना , जूते मारना ये सब मुहावरे यूँ ही नहीं बने / शादी में दुल्हे के जूते चुराई की रसम तो न जाने कब से चली आ रही हे / आज सही मोका हे जब जूते की सेकुलर तस्वीर का उपयोग कर कोमुनल फोर्सिज को हराया जा सकता हे / जूता अमीर , गरीब राजा रंक , फकीर सभी के पास हे / गरीब सुदामा भी क्रिशन जी से जूते पहन कर ही मिलने गया था /जूते की महत्ता आप समय से पहले समझ आम जनता को एक मकसद दे दिया / जूता दान महा दान ,जूता खावो , सत्ता पावो / आपका जूता अभियान दिन दूना रात चोगुना तरक्की करे / पर संभल कर , पुलिस को भी अब जूते चप्पल से नेताओं को बचाने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है / इस लिए जूता बिर्गेड को रिफ्रेशर कोर्ष अवश्य कराइए / http://satish3840.jagranjunction.com

के द्वारा: satish3840

मुनीश बाबु, नमस्कार! यह जूता जरा सा चलता फिरता नाम है. इसे पादुका में परिवर्तित करिए! चरणपादुका प्रक्षेप समिति मेरे और गजोधर भाई के तरफ से सुझाया गया नाम है, अब यह आपके समिति के सदस्यों पर निर्भर करता है कि इसे स्वीकारें या स्थाई समिति में विचारार्थ भेज दे! मैं और गजोधर दोनों ही आपकी समिति में सक्रिय सदस्य बनना चाहते हैं. इसके दो फायदे हैं. एक यह कि हम दोनों के जूते एक ही साइज़ के और लोकल मेड हैं इसलिए सस्ते भी हैं. हमलोग दोनों ही जोर जोर से कहेंगे कि जूता हमने फेका है, अब पुलिस भी कंफ्यूज हो जायेगी कि गिरफ्तार किसे करना है. दूसरा कि कभी कभी हमलोग दूसरों के जूते जो मंदिर आदि के बाहर उतारे मिलते हैं उसे भी पहन लेते हैं इससे और कंफ्यूजन होगी कि जूता फेकने वाला या फेकवाने वाला दरअसल कौन है ? फिर जांच समिति और जाँच आयोग..... तबतक तो पांच साल निकल ही जायेंगे! ...... बहुत उपकार होगा अगर आप हमदोनो को ही अपनी समिति में शामिल कर ले! कुछ त्रुटियाँ थी इसीलिये उन्हें सुधारकर पुन; जमा कर रहा हूँ.

के द्वारा: jlsingh

मुनीश बाबु, नमस्कार! यह जूता जरा सा चलता फिरता नाम है. इसे पादुका में परिवर्तित करिए! चरणपादुका प्रक्षेप समिति मेरे और गजोधर भाई के तरफ से सुझाया गे नाम है, अब यह आपके समिति के सदस्यों पर निर्भर करता है किइसे स्वीकारें या स्थाई समिति में विचारार्थ भेज दे! मैं और गजोधर दोनों ही आपकी समिति में सक्रिय सदस्य बनना चाहते हैं. इसके दो फायदे हैं. एक यह कि हम दोनों के जूते एक ही साइज़ के और लोकल मेड हैं इसलिए सस्ते भी हैं. हमलोग दोनों ही जोर जोर से कहेंगे कि जूता हमने फेका है, अब पुलिस भी कंफ्यूज हो जायेगी कि गिरफ्तार किसे करना है. कभी कभी हमलोग दूसरों के जूते जो मंदिर आदि के बाहर उतारे मिलते हैं उसे भी पहन लेते हैं इससे और कंफ्यूजन होगी कि जूता फेकने वाला या फेकवाने वाला दरअसल कौन? फिर जांच समिति और योग तबतक तो पञ्च साल निकल ही जायेंगे! ...... बहुत उपकार होगा अगर आप हमदोनो को ही अपनी समिति में शामिल कर ले!

के द्वारा: jlsingh

के द्वारा: munish

मनीष जी, बहुत सारगर्भित लेख है. लेकिनक्या इससे उन की आँखें खुलेंगी जिनके लिए ये लेख लिखा गया है?इसके लिए कहीं न कहीं हम सब भी जिम्मेदार हैं.इस देश का पूरा इतिहास पढने से ये स्पष्ट हो जाता है की हमारी सारी समस्याओं के मूल में हमारा अत्शय उदार होना भी है. हमने बाहा से आने वाले सभी लोगों को " जियो और जीने दो" के सिद्धांत को मानते हुए गले से लगाया और सब को अपना अपना मजहब फेलाने का पूरा अवसर दिया. नतीजतन आज हम लोकतान्त्रिक भारत में आने वाले तीस चालीस साल में हिन्दुओं के अल्पसंख्यक बन जाने या जातीय समीकरण के साथ मुस्लिम तथा इसाई समीकरण के चलते सत्ता च्युत होने के खतरे से रूबरू होने वाले हैं. इसके लिए सावरकर तथा डॉ. हेडगेवार के रास्ते पर चल कर ही देश को तथा यहाँ की संस्कृति को बचाया जा सकता है. बशर्ते सभी देशभक्त लोग देश की असली समस्या को समझें और जैसा की "कम्युनल ट्राएंगल इन इंडिया"(१९४२) के लेखक द्वय अच्युत पटवर्धन तथा अशोक मेहता ने बाद में कहा की हमें फोनी सेकुलरिज्म को छोड़कर खरी-२ बात कहने की आदत डालनी होगी. स्पष्टवादिता के साथ हिन्दू मुसलमानों में खुलकर बात होने से ही देश के हिन्दू मुस्लिम मसले सुलझ सकते है. संविधान सभा में मुस्लिम आरक्षण पर बोलते हुए बेरिस्टर तजमुल हसन ने कहा था की देश के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द नहीं होना चाहिए क्योंकि देश के सभी नागरिक एक ही हैं. अन्य मुस्लिम सदस्यों ने भी इस बात को दोहराया था. लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं, विशेषकर पंडित नेहरु, ने अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की निति का अनुसरण करते हुए ऐसे तमाम काम किये जो आज देश के लिए पूरी भीषणता के साथ चुनौती बने हैं. हमारी साफ़ दृष्टि ही देश को बचा सकती है.

के द्वारा: Anil Gupta

मुनीश जी, नमस्कार! काफी दिनों बाद आपका यथार्थ परक आलेख पढने को मिला! आपने इतिहास का हवाला देकर सबको समझाने का प्रयास किया है कि आरक्षण विभाजन का कारण बना!.... दुःख तो इसी बात का है कि नेतागण हमें बाँटते जाते हैं और हम बंटते जाते है. कभी धर्म के नाम पर, तो कभी जाति के नाम पर; कभी भाषा के नाम पर तो कभी प्रान्त और अंचल के नाम पर. यहाँ तक कि सेना में भी बिहार बटालियन, असम बटालियन, राजस्थान बटालियन,पंजाब बटालियन .... आदि आदि, यह सब क्या है?... मंत्रिमंडल गठन में भी जाति, समुदाय आदि का ध्यान रखना... यह सब क्या है? यह सब अंतहीन मुद्दा है. हम सब कभी भारतीय होने का दंभ नहीं भरते. हमारा राष्ट्र गान भी पंजाब सिंध गुजरात मराठा .... की बात करता है... आखिर हम कब भारतीय होंगे. हमारा एक धर्म (राष्ट्र धर्म) होगा और हमारी एक भाषा, एक मिशन होगा!!!!!

के द्वारा: jlsingh

आज़ादी के उपरान्त जो मुसलमान भारत में रह गए निसंदेह उनकी भारत के प्रति निष्ठा थी, उन्होंने पाकिस्तान पर भारत को तवज्जो दी और वो यहीं पर रहे, और आधुनिक भारत के निर्माण में अपना योगदान दिया. लेकिन आधुनिक शिक्षा के महत्त्व को उन्होंने तब भी नहीं समझा और धार्मिक शिक्षा को वरीयता दी आधुनिक भारत की सरकार ने भी इस विषय में गंभीरता से नहीं सोचा, और जैसा की आज़ादी से पूर्व ही कांग्रेस की नियति में शामिल था की मूल समस्या को जड़ मूल से ख़त्म करने के स्थान पर ऊपर से इलाज़ करना और केवल सत्ता चलाने में मुसलमानों का समर्थन मिलता रहे इसलिए उस समर्थन को गैरवाजिब मांगें मानकर खरीदना. तत्कालीन सरकारों ने उस साम्प्रदायिक खाई को जो की लॉर्ड मिन्टो ने डाली थी और जो तथाकथित आज़ादी और बंटवारे के उपरान्त पाटी जा सकती थी, उसको बढ़ने दिया ……..! न केवल साम्प्रदायिक आधार पर बल्कि वर्गों और जातियों के आधार पर भी ……..! मुनीश जी आपने स्वयं जाने - अनजाने अपने कथन को स्वयं ही सिद्ध कर दिया है और समस्या अभी यहीं तक नहीं रहने वाली नहीं है जैसे की आपने आशंका जाहिर की है शायद मैं तो वह दिन देखने के लिए न भी रहूँ पर आप जरूर देखेंगे की जिस अशिक्षा को आप अल्प्संखयों के लिए अभिशाप मान रहे हैं वाही आगे चल कर इस देश में उनको शासक बना देगी कारण यह है कि इसी अशिक्षा के कारण अल्पसंख्यक अपनी आबादी दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ा रहे है - और मुझे यह पता नहीं कि आप देश के किस हिस्से में रहते है लेकिन मैं अपने ही शहर की बात करूँ तो यहाँ (मेरठ - उत्तरप्रदेश ) देश ही नहीं दुनिया का सबसे प्रशिद्ध क्रांति का शहर है लेकिन आजकल दुनिया का सबसे बड़ा जानवरों को कटाने और और मांस एक्सपोर्ट करने का केंद्र होने के साथ ही चोरी कर लाये गए मोटर कार और बड़े वाहनों को अवैध रूप से काटने का केंद्र है जिसमे १०० प्रतिशत भागीदारी केवल अल्पसंख्यक वर्ग कि है / यह तो मैंने एक उदहारण दिया है और शायद राजनितिक पार्टियों कि भी यही सोंच रहती होगी कि इनको अपने पक्ष में करें. / शेष फिर कभी.

के द्वारा: s.p.singh

के द्वारा: munish

के द्वारा: gautam giri

मुनीश साहब, नमस्कार! काफी दिनों बाद आपके आलेख पढ़कर सुखानुभूति हुई. आपने बहुत ही गंभीर विषय को उठाया है. मेरी बातों को अगर विनोद में लें तो मैं कुछ अपने विचार व्यक्त करना चाहूँगा..... कहते है कमजोर विद्यार्थी अच्छा शिक्षक होता है क्योंकि उसे पता है विद्यार्थी कमजोर क्यों होता है, वह अपने जैसे विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान देगा. उसी तरह पुराना रोगी अपनी बीमारी का एक विशेषग्य (डॉक्टर) बन जाता है. युद्ध जीतने के लिए भी हम दुश्मन के किसी आदमी को विभीषण बनाते हैं. अब अगर गंभीरता से विचार करें तो निजी संस्थान जातिगत आधार पर (सरकारी नियमानुसार)आरक्षण कहाँ देते हैं? भले ही वहां 'विशेष प्रकार' का आरक्षण लागू होता है. और सरकारी विद्यालयों में किनके बच्चे पढ़ते हैं? यह भी आप भलीभांति जानते हैं. दूसरी तरफ अब न्याय पालिका और सेना भी आरक्षण देने की बात चल रही है. वैसे भी हमसभी न्यायपालिका में बिश्वास करते है जबकि वहां भी न्याय की कोई गारंटी नहीं है अभी भी! तभी तो जन लोकपाल के अन्दर न्यायपालिका को भी लाने की बात कर रहे हैं. वैसे आपके विचार अच्छे और विचारणीय है. मेरे ख्याल में कही भी आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है. जरूरत है सबको सामान अवसर प्रदान करने की. पर हमारे भाग्यविधाता तो "कुछ"और ही सोचते हैं.

के द्वारा: jlsingh

के द्वारा: munish

आदरणीय पियूष जी, अभी एक न्यूज़ चेनल के एक सर्वे में नब्बे प्रतिशत लोगों ने थप्पड़ को सही बताया...... आज के जागरण के सर्वे में ७२% लोगों ने सर्वे को सही बताया......... वास्तव में ये आक्रोश ही है न की जबरदस्ती हम इस थप्पड़ को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं....... आपका पुलिस वाला तर्क वहां पर ठीक है जहां सच का पता जनता को पता नहीं हो लेकिन जहां सच का पता जनता को होता है वहां जल्दी से भ्रम में नहीं आती .......... माननीय मंत्रीजी या आज के नेताओं के सम्बन्ध में आज की जनता सच जानती है और इसीलिए थप्पड़ को सही बता रही है........ कभी कभी गेहूं के saath में घुन भी पिस जाता है लेकिन शायद नेताओं के सम्बन्ध में ऐसा नहीं होगा ............ नहीं तो आप ही जरा बताइये की आज के दौर के किस नेता को आप आदर्श मानेंगे और उसका अनुसरण करेंगे.........

के द्वारा: munish

आदरणीय मुनीश जी....... नमस्कार ........ जैसा की अपने ब्लॉग मे मैं इस घटना के प्रति अपनी असहमति जता चुका हूँ.... तो मैं उसपर अभी भी कायम ही हूँ..... वास्तव मे जिसे हम जनता का आक्रोश कह कर बढ़ावा दे रहे हैं...... वो अराजकता को बढ़ावा देने की बात है.... आप अगर कुछ सही कर रहे हैं तो भी आपके कई विरोधी खड़े हो जाते हैं...... जैसा की आप जानते ही है.... की इस बेईमान दुनिया मे ईमानदार व्यक्ति से अधिक दुश्मन किसी के नहीं होते है.... पुलिस के निर्ममता का एक कारण ये भी है की उसको अपराधियों के साथ मारपीट करते देखने के आदि हो चुके हम लोग जब किसी बेकसूर को भी पीटता देखते हैं तो बरबस ही ये मान लेते हैं की ये भी अपराधी ही होगा... और एक बेकसूर यूं ही पीट जाता है..... आक्रोश के नाम पर कल इसी तरह के लोग हर उस व्यक्ति को भी इसी तरह मारने लग सकते हैं जो की इनके किसी भी कृत्य का विरोध करेगा....... अफसोस इस बात का है की आज इस व्यक्ति का समर्थन करने वालों का मतदान वाले दिन वोट या तो जाति या धर्म या क्षेत्र या फिर नोट के लिए पड़ेगा...... और या फिर कुछ बुद्धिजीवी उस दिन मतदान से ही दूरी बनाए रखेंगे......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

के द्वारा: munish

नमस्कार मुनीश जी बहुत ही आजकल इन थप्पड़ों की गूंज ज्यादा ही सुनाई देने लगी है मुनीश जो जो की मुझे लगता है काफी गंभीर विषय होता जा रहा है , जिसकी मैं निंदा तो नहीं करूँगा क्योंकि लोग परेशान हैं झुंझलाहट मैं हैं और अपनी हर परेशानी का कारण वे आज के नेता को मानते हैं ! लेकिन मैं इस प्रकार की हिंसा की प्रशंशा भी नहीं कर सकता, क्योंकि कल के थप्पड़ काण्ड से एक और चीज मुझे चिंतित कर रही है की अभी तक जिस किसी भी राजनेता पर हमला हुआ उसमे प्रहार करने वाले के अतिरिक किसी और पर प्रभाव नहीं पड़ा ! किन्तु शरद पवार के केस मैं देखने मैं आ रहा है की उनके समर्थकों ने सड़कों पर उतर कर हिंसक विरोध शुरू कर दिया है, जिसका खामियाजा भी आम जनता को ही भोगना पड़ रहा है ! और यदि ये परम्परा शुरू हो गई तो शायद ये हमारे देश के लिए और भी खतरनाक होगा !

के द्वारा: allrounder

के द्वारा: munish

के द्वारा: jlsingh

के द्वारा: munish

के द्वारा: nishamittal

के द्वारा: whokshooncano

के द्वारा: Dortha

के द्वारा: Dweezil

के द्वारा: Meadow

के द्वारा: munish

के द्वारा: pankaj

के द्वारा: munish

के द्वारा: munish

के द्वारा: Abhishek

के द्वारा: munish

के द्वारा: munish

अनीता जी, मैं आपका आभारी हूँ जो आपकी कलम ने हमारे लेखन के विषय में लिखा....आपका हमारे ब्लॉग पर स्वागत है....पता नहीं आपको ऐसा क्यों लगता है की में नारी की दशा के विषय में नहीं लिखता....... हाँ आपके कथनानुसार नारी मुक्ति के विषय में नहीं लिखता..... नारी की दशा के विषय में तो मैंने इसी लेख में थोडा बहुत लिख दिया है और अन्य ब्लोग्स भी हैं........ परम्पराएं दकियानूसी नहीं होती कम से कम भारत में तो नहीं......... हाँ हम अपनी अज्ञानतावश उनके महत्त्व को कम करके आंकते हैं...... सच से भागते हैं.... उनके महत्त्व को समझ न पाने के कारण नकारते हैं और परम्पराओं को दकियानूसी कहते हैं........ मुझे कभी नहीं लगा की नारी किसी तरह की गुलामी का जीवन जी रही है....... हाँ कुछ मुद्दे हैं जिन पर मैं अपने व्यंगात्मक लहजे में समय समय पर लिखता रहता हूँ.........! यकीन मानिए मैं नारियों का दुश्मन नहीं हूँ परन्तु इतना जरूर है बिना वजह के नारी संगठनो द्वारा चलाये जा रहे नारी मुक्ति के आंदोलनों के खिलाफ हूँ....... ये नारी संगठन कोई सार्थक कदम क्यों नहीं उठाते नारियों की दशा के खिलाफ.....भ्रूण हत्या के खिलाफ क्यों कुछ नहीं करते..... दहेज़ के खिलाफ तो आज तक कुछ कर नहीं सके..... नारी को शिक्षा का महत्त्व तो समझाया नहीं (और बताया भी तो व्यावसायिक शिक्षा का ) ग्रामीण महिलाओं के लिए तो आजादी के साथ साल में भी कुछ नहीं किया इन नारी मुक्ति संगठनो ने.......... अरे आप कुछ सार्थक बात कहिये मैं उसका तहेदिल से समर्थन करूंगा और सिर्फ इसलिए नारी मुक्ति का समर्थन करूं की कुछ नारी संगठनों ने ये मान लिया की नारी गुलाम है, पुरुष द्वारा प्रताड़ित है .......... कुछ तर्क तो हो ....... कुछ दम तो हो...... कुछ ज्ञान की बात तो हो. चलो छोड़िये ज्यादा लम्बा व्याख्यान हो गया........ आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया...... वैसे आप मेरे सभी ब्लोग्स पढ़ेंगी तो शायद आप को लगेगा की मैं नारियों के विषय में भी लिखता हूँ

के द्वारा: munish

के द्वारा: munish

के द्वारा: munish

के द्वारा: Ramesh Nigam

प्रिय मुनीश जी ....नमस्कार ! आप का खुद पर वयंग्य करने का अंदाज़ अनूठा है .... इससे पहले आपका (10000-5000) वाला वयंग्य अच्छा लगा था ..... आज आपने अपने इस लेख का जिक्र किया तो मैंने खुद की उस समय की भूगोलिक सिथति देखी तो पाया की उस समय हम स्वामी जी बने हुए जनता जनार्दन से माया ऐंठ रहे थे .... हमारे पंजाब (आपका भी ) में यह एक बहुत ही मशहूर घटना है जिस पर की भगवंत मान ने भी एक मजेदार कैसेट निकाली थी .... लेकिन आपने इसमें खुद को लपेटे में लेते हुए इसको एक अलग तरीके स+सुन्दर तरीके से पेश किया है ..... लेकिन पढ़ते हुए ज्यादातर समय ऐसा महसूस हो रहा था की जैसे मेरी आत्मा आपके शरीर में अपने शौंक पुरे करने के लिए चली गई हो .... कई बार तो ऐसा भरम हुआ की आपने बस मेरा नाम ही नहीं दिया बाकी खासियते आपमें भी मेरे वाली ही है ..... इस सुन्दर वयंग्य को ध्यान में लाने के लिए मैं आपके साथ -२ जवाहर सिंह जी का भी आभारी हूँ .... धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: SYED SHAHENSHAH HAIDER ABIDI

मुनीश जी आपको जान कर आश्चर्य होगा की अमेरिका में गिरफ्तार हुए आई एस आई एजेंट गुलाम नबी फई के इन भारतीय लोगों से भी सम्बन्ध थे. ये है भारत में सेकुलर ढोंग के जाने पहचाने चेहरा. पहले मुझे भी विश्वास नहीं हुआ था पर कल से जब दूसरे अख़बारों ने भी (जागरण भी) फई के भारतीय लिंक पर लिखा तब मुझे यकीन होने लगा. जरा इन नामों पर गौर करें. १- लेखक और संपादक कुलदीप नैयर २- अग्निवेश ३- दिलीप पडगांवकर ४-मीरवाइज उमर फारूक ५-राजेंद्र सच्चर [ये ही सच्चर कमिटी के चीफ है जिन्होंने एक तरह से ये पूरा देश मुसलमानों को देने की सिपारिश की है . अब पता चला क्यों की है ] ६ – पत्रकार गौतम नवलखा, ७- इंडिया टुडे के ब्योरो चीफ हरिंदर बवेजा, ८- मनोज जोशी, ९- हामिदा नईम, १०- वेद भसीन, ११- जेडी मोहम्मद १२- अरुंधती रॉय १३-यासीन मालिक १४- कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह http://www.deccanchronicle.com/channels/world/north-america/fai-managed-rope-indian-journalists-and-intellectuals-isi-plan-074

के द्वारा: K M Mishra

मानव संसाधन मंत्रालय में कपिल सिब्बल के सलाहकार के रूप में अज़ीज़ बर्नी की नियुक्ति की गई है… यह अज़ीज़ बर्नी साहब वही हैं जिन्होंने 26/11 के मुम्बई हमले के बाद उस हमले की जिम्मेदारी RSS पर थोपने के उद्देश्य से एक पुस्तक भी लिखी है। पुस्तक का विमोचन दिग्विजय ...सिंह ने किया था एवं इस पुस्तक में अज़ीज़ बर्नी ने कल्पना की ऊँची उड़ान भरते हुए 26/11 हमले के पीछे RSS और इज़राइल का हाथ होने सम्बन्धी किस्से गढ़े थे, बाद में दबाव बढ़ने पर माफ़ी भी मांगी गई और "उर्दू सहारा" से इस किस्सागो को लतियाया भी गया था। इसी अज़ीज़ बर्नी को "पाठ्यक्रम" में बदलाव हेतु सुझाव देने के लिए कपिल सिब्बल का सलाहकार नियुक्त किया गया है

के द्वारा: K M Mishra

यह आतंकवादी - फातंक्वादी कुछ नहीं है यह सब जान बूझकर करवाया जाता है | हमें तो लगता है की जनता का ध्यान बटाने के लिए यह सब हमारे so called नेताओं द्वारा सुनियोजित तरीके से करवाया जाता है | १३१ करोड़ में दो चार मर गए तो क्या फर्क पड़ता है राजनीती की रोटी तो सेंकने को मिल जाती है | बयान का क्या लचीली जबान है फिसल ही जाती है | AC में आरामदेह कुर्सी पर बैठकर, पब्लिक के पैसे से मेवा खाते हुए कुछ भी बक दो क्या फर्क पड़ता है, जनता बेवक़ूफ़ है दो दिन बाद भूल जाएगी, किसी को पकड़ लेंगे और उसकी जमाई खातीर की जाएगी, पडोसी देश पर आरोप थोप देंगे बस हो गया | पब्लिक भी भूल जाएगी और नेता मस्त और अगले घटना के लिए प्लान बनाना शुरू | कितना अच्छा business है ज़रा सोचिए, डाक्टर, दवाई बेचने वाले, बनाने वाले, अस्पताल, पुलिस, नेताजी सबकी कितनी अच्छी कमाई होती है | मीडिया वालो को मसाला मिल जाता है, उनमे होड़ लग जाती है की कौन कितना लाइव न्यूज़ देगा, कौन उस तड़पते हुए लहुलुहान इंसान को दुनिया को पहले दिखाकर अव्वल चैनल का खिताब पाएगा | इन सब घटनाओं से आम पब्लिक थोड़े दिनों तक बाकी समस्याओ के बारे में भूली रहती है और हमारे नेताओं को राजनीति की रोटी अच्छी तरह सेंकने का मौका मिल जाता है | इन्ही सब वजह से यह कहा गया है की "आतंकवादी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता" (अगर रोक देंगे तो पब्लिक को बेवक़ूफ़ कैसे बनाएँगे)| हम सब ही को एकजुट होकर महानुभाव का नकाब पहने घर के अन्दर के आतंकिओं को बेनकाब करना होगा तभी कुछ हो पाएगा | वन्दे मातरम

के द्वारा: Martanday

भारत में इतिहास लेखन किस प्रकार   सेकुलर धर्म निभाते हुए किया जाता है इसके बारे में आदरणीय शंकर शरण का यह लेख पढ़िए कुछ पंक्तियाँ नीचे दे रहा हूँ. पूरा लेख पढाने के लिए नीचे दिए लिंक पर जाना होगा.  http://www.pravakta.com/story/27337 . रोमिला जी ने सन् 1010 से लेकर 1991 तक इतनी चीजों को जोड़ कर सोमनाथ और महमूद गजनवी पर इतिहास लिखा। जरा सोचिए। मामला ऐतिहासिक तथ्यों का नहीं, सेक्यूलरिज्म के भविष्य का है। तब आप समझ सकेंगे कि ‘अपने देश से कटे हुए’ पश्चिमी भारतविदों और ‘हिंदू सांप्रदायिक’ इतिहासकारों ने महमूद गजनवी के साथ कितनी नाइंसाफी की। पर मुश्किल यह है कि महमूद के बारे में उसके अपने विद्वान अल बरूनी से लेकर बीसवीं सदी में मुहम्मद हबीब तक अनगिनत इतिहासकारों ने ही ढेर सारी गड़बड़ बातें लिख छोड़ी हैं। जैसे, अल बरूनीः “महमूद ने (भारत की) उन्नति को तहस-नहस कर दिया औ ऐसे लाजबाव कारनामे किए जिससे हिन्दू धूल-कणों की तरह हर दिशा में बिखर गए और उनकी कहानियाँ ही बच गई। तब से इन बिखरे लोगों में सभी मुसलमानों के प्रति तीव्र घृणा भर गई”। अल बरूनी को पता न था कि ऐसा लिखने से हजार साल बाद भाजपा को लाभ हो सकता है। मगर हबीब साहब का क्या करें! इन्होंने बीसवीं सदी में लिख दियाः “न कोई ईमानदार इतिहासकार, न कोई मुसलमान जो अपने मजहब से वाकिफ है, मंदिरों का वह मनमाना विध्वंस छिपाने की कोशिश करेगा जो गजनवी की फौजों ने किया था… लोगों को जो सबसे प्रिय हो उसे लूटकर मित्रवत नहीं बनाया जा सकता, न ही लोग ऐसे मजहब को पसंद करेंगे जो लुटेरी फौजों के रूप में आए और खेतों को बर्बाद व शहरों को तबाह करके छोड़ दे… महमूद की नीति ने (हिंदुओं द्वारा) इस्लाम को जाने बिना ही खारिज कर देना पक्का कर दिया।” क्या बुजुर्गवार को सब कुछ लिखना जरूरी था? जरा तो होशियारी बरतनी थी। अफसोस, उनके निकट कोई रोमिला थापर जैसा दूरंदेश मौजूद न था।

के द्वारा: K M Mishra

मुनीश जी आपको जान कर आश्चर्य होगा की अमेरिका में गिरफ्तार हुए आई एस आई एजेंट गुलाम नबी फई के इन भारतीय लोगों से भी सम्बन्ध थे. ये है भारत में सेकुलर ढोंग के जाने पहचाने चेहरा. पहले मुझे भी विश्वास नहीं हुआ था पर कल से जब दूसरे अख़बारों ने भी (जागरण भी) फई के भारतीय लिंक पर लिखा तब मुझे यकीन होने लगा. जरा इन नामों पर गौर करें. १- लेखक और संपादक कुलदीप नैयर २- अग्निवेश ३- दिलीप पडगांवकर ४-मीरवाइज उमर फारूक ५-राजेंद्र सच्चर [ये ही सच्चर कमिटी के चीफ है जिन्होंने एक तरह से ये पूरा देश मुसलमानों को देने की सिपारिश की है . अब पता चला क्यों की है ] ६ - पत्रकार गौतम नवलखा, ७- इंडिया टुडे के ब्योरो चीफ हरिंदर बवेजा, ८- मनोज जोशी, ९- हामिदा नईम, १०- वेद भसीन, ११- जेडी मोहम्मद १२- अरुंधती रॉय १३-यासीन मालिक १४- कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह

के द्वारा: K M Mishra

इसलिए यदि आतंकवाद बढ़ता है तो बढ़ने दो, प्रधानमन्त्री मौन हैं तो रहने दो, जनता स्वार्थ में लिप्त है तो रहने दो, कालाधन विदेशों में जमा हो रहा है तो होने दो, दंगे होते हैं तो होने दो, देश लुटता है तो लुटने दो क्योंकि ये सब इतिहास में दर्ज होगा और जब कोई घटना ही घटित नहीं होगी तो इतिहास कैसे लिखा जाएगा….! बहुत ही सशक्त प्रहार किया है आपने! पहले कलम में ताकत होती थी, पर आज पढ़नेवाले वाले शिर्फ़ प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुप हो जाते हैं. हम कब जागेंगें? शायद अमरीका? ओबामा? हिलेरी तो सोनिया जी को सहलाकर चली गयी.दोनों की मुस्कुराहटें साफ़ बयान कर रही थी - मरनेवाले आम आदमी, कीड़े -मकोड़े थे. थोड़ा ठाकरे बंधुओं और विपक्षियों को भड़ास निकाल लेने दो. इस तरह महंगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा थोड़े दिन तक दबा रहेगा.

के द्वारा: J L SINGH

के द्वारा: munish

के द्वारा: munish

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: munish

के द्वारा: munish

के द्वारा: Munish

मुनीश जी ,,,सरकार तो बिजूके पर खडी ही हो गयी है अगर आपके पास भी बड़ा सा बांस का डंडा हो तो नीचे आप भी लगा दीजिये देश की जनता खुश हो जाएगी ,,अच्छा व्यंग और हाँ यह जनजागृति की शुरुवात है मुझे तो इस बात की चिंता है की अगर यही आलम रहा तो यह क्रांति कहीं रक्त रंजित क्रांति में न बदल जाए ,,क्योंकी जो भ्रष्टाचार में आकंठ (सामान्य लोग ) डूबे हैं वह भी अब आंशिक या पूर्णतः समर्थन कर रहे हैं अगर कहीं यह जन आन्दोलन दुसरा रुख अख्तियार कर लेगा तो इसे संभालना बहुत ही दुष्कर होगा ,,सरकारों की हालत तो आप देख ही रहे हैं और अब तो सामान्य जन मदोंनमादित हो गया है हरियाणा में लाठी चार्ज महिलाओं के ऊपर थाने में बालिका की लाश क्या लिखूं किस किस के कारनामे ....... जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

के द्वारा: Munish

के द्वारा: jagojagobharat

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

आपका ये लेख पड़ा आपने सच कहा की केवल और केवल कानून बन जाने से कुछ नहीं होगा, अन्ना हजारे जी एक महान इन्सान है अनुभवी है पर फिर भी लोकपाल विधेयक को जन लोकपाल विधेयक बनवाने की जो उनकी मांग है उससे विधेयक में कुछ ऐसा हो जाएगा की भ्रस्ताचार समाप्त हो जायेगा ऐसा संभव नहीं है, फिलाल देश और जंतर मंतर पर जो लोग है वो यही गलतफेमी पाले हुहे है की सर्कार ने अन्ना हजारे जी की बात मानी नहीं और भ्रस्ताचार समाप्त हहा नहीं. पुलिस का गठन इसलिए हुआ था की अपराध को बड़ने से रोका जा सके परन्तु अपराध दिन दुगनी रत तरक्की पर है. रही बात कानून की एक अपराधी एक कानून के तहेत सजा पाकर जेल जाता और फिर उसी कानून के तहेत बहार भी आ जाता है. सवाल एक और कानून बन जाने का नहीं है सवाल है सिस्टम को बदलने का जो मांगने से बदलने वाला नहीं उसके लिए मिस्त्र जेसी क्रांती की जरुरत होती है और हमारे देश वासियों की सबसे बड़ी दिक्कत यही है की आसन रास्ता क्या है उसे चुनते है,अब अन्ना जी ने दिखा दिया और चल पड़े पर ये सोचने का वक़्त किसी के पास नहीं ये स्थायी हल है या कुछ समय का बुल्बुल्ला, चलिए लोगो को एक उम्मीद जागी है और मेरी दुआए यही है की लोगो की उम्मीदे पुरी हो और उनकी भ्रस्ताचार के खिलाफ जो लडाई है उसमे जीत हो और में गलत साबित होऊ इसी आशा के साथ आपके ख़ूबसूरत लेख के लिए आपको बधाही.

के द्वारा: anil9gupta

के द्वारा: Munish

मुनीश जी नमश्कार के सार्थक लेख है ... जैसा शाही जी ने कहा की फिलहाल तो इस समस्या कहे या व्यवस्था का कोई समाधान नहीं निकलता दिख रहा है ..क्योकि लड़के वाले जहा अपनी क्षमता के हिसाब से मांगने पर लगे है उससे कही ज्यादा व्याकुलता लड़की वालो में अपनी बेटी को देने की दिखाई देती है... फर्क ये है की लड़की पक्ष के साथ मजबूरी है...विवाह करने की .. और इस सबके आधार में है समाज में दिखावे का अन्दर तक लग चूका दीमक ... दिखावा ही जड़ है .. लड़के वालो को दिखाना है लड़की वालो को भी दिखाना है.... जैसा आपने लड़के की इच्छाओं के बारे में कहा ...लडकियों को भी आजकल अपने हिसाब से ..रणवीर कपूर जैसा दिखने वाला .. बिल गेट्स जैसा कमाने वाला पति चाहिए ..और वो साड़ी सुख सुविधाए चाहिए जो जीवन को रूमानी बनाये ... (हा हर लड़की के साथ ऐसा नहीं है .. वैसे ही जैसे हर लड़का वैसा नहीं सोचता ) मुनीश जी समस्या आप अगर ध्यान से देखे तो समझ सकते है .. आज समाज में कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता ....सब रेडीमेड चाहिए लड़की "" मई और मेरा हब्ब्बी "" के मूल मंत्र पर चला चाहती है .. लड़का भी कैटरीना कैफ सी बीवी पाकर सपनो की दुनिया में रहना चाहता है .. माँ -- बाप भी ले-देकर ऐसी सेटिंग बैठकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मानलेते है .... समाज में जबतक दिखावे का कार्यक्रम बरकरार रहेगा ऐसी समस्याए ख़त्म नहीं होंगी ....

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: Munish

के द्वारा: suryaprakashtiwadi

हम लोग होली मिलने उन लोगों के यहाँ पहुंचे जिनके घर वर्ष में कोई दुखद घटना हुई थी ऐसे पांच परिवार थे………..तो ऐसे हमने अपनी होली खेलने की शुरुआत की …………उन पांच परिवारों में मिलने के बाद हम ऐसे तीन परिवारों में गए जिनमें केवल बुजुर्ग ही थे और उनके बच्चे कहीं बाहर किसी दुसरे शहर में या कहीं विदेश में थे और वो लोग बिलकुल अकेले थे …………………..! हमने उन बुजुर्गों के साथ होली खेली और उन्हें होली पर अकेले पन का बिलकुल एहसास नहीं होने दिया…………………इस सब में ही दस प्रिय श्री मुनीश जी होली का यह रूप यह अंदाज और पहल बहुत अच्छी लगी | यह पोस्ट यकीनन अन्य लोगो को भी इस अंदाज के लिए प्रेरित करेगी | बधाई

के द्वारा: Ramesh Bajpai

मुनीश जी सादर वंदेमातरम ! आप यकीन नहीं मानेंगे होली कांटेस्ट के लिये मेरे अगले लेख का थीम यही थी । मैं क्रांतिकारियों की होली दिखाना चाह रहा था लेकिन टाईम मशीन पर बैठ कर ऐसी होली मैं नहीं लिख सकता था । द्वापर में प्रभू के संग होली खेल कर आप धन्य हुये और आपको पढ़ हम धन्य हुये । शब्द नहीं है मेरे पास इस लेख की तारीफ के लिये । सारे रंग मौजूद हैं केसरिया, सफेद, काला, नीला इस लेख में । आज होली है और मेरी यह होली अगर यादगार है तो सिर्फ इस लेख के कारण । मैं यह लेख कॉपी करने की अनुमति चाहता हूं । आपको होली की ढेर सारी शुभकामनाएं और प्रभू श्रीकृष्ण से प्रार्थना है कि अपने इस भक्त को ब्रज की होली में अपने साथ शामिल करें ।

के द्वारा: kmmishra

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

प्रिय ओमप्रकाश जी, सादर नमस्कार, अगर आप उच्च और सर्वोच्च न्यायलय पर विश्वास रखते है तो विशेष अदालत के निर्णय पर उंगली उठाने के बजाय उच्च और सर्वोच्च न्यायलय का सहारा लीजिये. कुछ लोग न्यायालय का फैसला तभी तक स्वीकार करते हैं जब तक उनके माफिक होता है. नहीं तो नहीं. संसद केवल 5 वर्ष के लिए जनता का प्रतिनिधित्व करती है. जनता चिरंतन है. जनता समयानुसार अपना फैसला बदलती रहती है. आप नहीं मानते कि इस देश में हिन्दू की बात करना साम्प्रदायिकता है. लेकिन यह वास्तविकता है. आप मानने, न मानने को स्वतंत्र हैं. ' हिन्दू-हिन्दू” या मुस्लिम-मुस्लिम बोलना बंद करिए और सिर्फ भारतीय और हिन्दुस्तानियों की बात करिए ' बड़े उदात्त विचार हैं आपके. मैं भी यही चाहता हूँ. आपके इस कथन में कि ' जो अपने को हिन्दुस्तानी कहने का मदद रखते हैं उनकी सुनिए ' में कुछ जोड़ना चाहूंगा कि ' अपनी आँख खुली रखिये और वास्तविकता से आँख न मूंदिये. अगर आप लोकतान्त्रिक न्याय व्यवस्था में विस्वास करते होते तो यह न लिखते ' आपने अदालत के फैसले को ध्रुव सत्य (absolute truth ) कैसे मान लिया '. किसको ध्रुव सत्य माना जाय. आपके विपरीत विचार व्यक्त करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.

के द्वारा: डा.. एस शंकर सिंह

सिंह साहब, अगर लोकतान्त्रिक न्याय व्यवस्था में विस्वास ना होता तो मैं उच्च और सर्वोच्च न्यायलय की बात क्यों करता.. मैं नहीं मानता की इस देश में हिन्दू की बात करना साम्प्रदायिकता है , जैसा की आपने लिखा. आप लोग ये हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई वाला चस्मा उतर दीजिये और ऐसे देखिये की हम सभी भारतीय हैं हाँ कुछ बातें ऐसी जरुर है जो रास्त्र हित में होनी जरूरी है जैसे के एक यूनिफार्म सिविल कोड़े को लागू करना परन्तु वोते की राजनीती के कारन ऐसा नहीं हो पा रहा. कट्टर मुस्लिम समाज इसका विरोध कर रहा है. न्यायालय ने शाह बानू केस में मौका भी दिया की हम यह परिवर्तन लायें पर राजीव गाँधी बैक मार गए और एक केन्द्रीय मंत्री (जो खुद मुस्लिम थे) को कुर्सी छोडनी पड़ी क्योंकि वे यूनिफार्म सिविल कोड के पक्ष धर थे. तो वहां आपकी जनता की अदालत फेल हो गयी (संसद जनता की अदालत ही तो है) . मेरा आप से यही कहना है की ये "हिन्दू-हिन्दू" या मुस्लिम-मुस्लिम बोलना बंद करिए और सिर्फ भारतीय और हिन्दुस्तानियों की बात करिए और जो अपने को हिन्दुस्तानी कहने का मदद रखते हैं उनकी सुनिए. .

के द्वारा: omprakash

प्रिय मुनीश जी, सादर नमस्कार. मोस्ट व्यूड ब्लॉगर बनने पर आपको बहुत बहुत बधाई ओमप्रकाश जी को आप ने यथार्थपरक करार जवाब दिया है. अगर अदालत के फैसले को ध्रुव सत्य (absolute truth ) न माना जाय तो क्या किया जाय. इसके बाद ओमप्रकाश जी उच्चतम न्यायालय जा सकते हैं. ऐसा लगता है कि माओवादियों की तरह ओमप्रकाश जी को भी देश के संविधान न्याय व्यवस्था, लोकतांत्रिक पद्धति में कोई विश्वास नहीं है.एक बात और, हमारे देश में जब हिन्दू मारा या जलाया जाता है तो वह ' सेक्युलरिज्म ' कहलाता है. हिन्दू के लिए न्याय की बात करना साम्प्रदायिकता है. यह है ओमप्रकाश जी जैसे लोगों की मानसिकता. जनता इन बातों को समझ रही है. फैसला तो जनता की अदालत में ही होना है.

के द्वारा: डा.. एस शंकर सिंह

के द्वारा: Munish

आदरणीय ओमप्रकाश जी, यदि आपको मेरी सोच में साम्प्रदायिकता नजर आती है. तो मेरा लेख सार्थक हुआ क्योंकि साम्प्रदायिकता तो वहीँ पर नजर आएगी जहाँ पर सम्प्रदायों को कोई मानता हो उनका मान करता हो, अगर कोई अपने को सांप्रदायिक नहीं मानता तो निश्चित ही अलगाववादी है. अदालत का फैसला आपको यदि गलत लगता है तो उच्च न्यायालय जा सकते हैं सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं जैसा आप स्वयम लिखते हैं. राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने का ठेका मुझे या मेरे जैसे लोगों को लेने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप जैसे बुद्धिजीवी स्वयं जानते हैं की क्या राष्ट्रहित में है और किससे राष्ट्र का नुक्सान, यदि किसी स्वार्थ का चश्मा अपनी आँखों पे लगाया हो तो बात दूसरी है. मैंने गुजरात पर इसलिए नहीं लिखा क्योंकि मेरी विषयवस्तु में गुजरात नहीं था गोधरा था. मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ फासिस्टों को फांसी दे देनी चाहिए शुरूआत कहाँ से करनी है ये भी बता दीजिये. जिन्होंने इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद कत्ले आम मचाया और उक्त कथन कहा जो मैंने लेख में दिया है. या जिन्होंने नाक्सालवाद और माओवाद का समर्थन किया, या जिन्होंने अयोध्या में निहत्थे लोगों पर गोलियां चलवायीं, या सिंगुर, नौअखली, के हत्याकांड समर्थकों को गुजरात के दंगों वालों को लगा ही देंगे. लोगों के अन्दर पूर्वाग्रह की भावना है अथवा नहीं विषय ये नहीं है विषय ये है की आपने जबरदस्ती इस लेख को नरेन्द्र मोदी और गुजरात से जोड़ कर अपनी पूर्वाग्रह ग्रस्त सोच का परिचय अवश्य दिया है. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: Munish

मुनिश्जी, आपका यह लेख पढ़ कर घोर निराशा हुयी क्योंकि इस में सांप्रदायिक सोच की छाप स्पष्ट है. अगर ये सेकुलरवादी लोग जो कहें या जो बोलें उस से किसी को एतराज क्यों कर हो. फिर तो मुझ जैसे व्यक्ति को भी आपके लिखे से एतराज होना चाहिए. आपने अदालत के फैसले को ध्रुव सत्य (absolute truth ) कैसे मान लिया जब की इस फैसले पर उच्च न्यायलय और बाद में उच्चतम न्यायलय भी विचार कर सकता है. आपने जिस तरह मीडिया पर यह कहते हुए आक्षेप किया की वो उन्ही को छापे जो लोग राष्ट्रिय हितों का ध्यान रखते हों गोया राष्ट्रिय हितों की परिभाषित करने का ठेका आप जैसे लोगों ने ही ले रखा हो. मोदी ने जो गुजरात के नर संहार में जो भूमिका निभाई उस पर तो आपने एक शब्द नहीं लिखा. क्या ऐसे फासिस्टों को फांसी की सजा नहीं होनी चाहिए? ऐसे एकतरफा ब्लाग पर इतने लोगो ने कमेन्ट किये यह लोकतांत्रिक आज़ादी की जीत जरूर है परन्तु इस से लोगों के पूर्वाग्रह ग्रस्त सोच की बदबू आती है.

के द्वारा: omprakash

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: CA Pankaj Jain

प्रिय मुनीष जी सादर वंदेमातरम ! यह आदमी आई एस आई का एजेंट भी हो सकता है क्योंकि साल में एक दो लेख कश्मीर पर इनके ऐसे होते हैं जिनमें यह साहब पाकिस्तान की जबान बोलते दिखते हैं और आड़ अलगाववादियों की होती है । कई बार यह सेना के विरोध में लिख चुके हैं । इनके प्रिय विषय हैं कश्मीर, पाकिस्तान, राष्ट्रविरोधी सुर में सेकुलरवाद, मानवाधिकार, भारत को हमेशा यह नसीहत देना (मुंबई हमले के वक्त भी) कि पड़ोसी से सम्बन्ध नहीं बिगाड़ने चाहिये, गुजरात दंगे, नरेन्द्र मोदी, तिस्तासीतलवाड़, विनायक सेन, कमुनिस्टों के पक्ष में सुर अलापना और नेहरू परिवार जिंदाबाद । इस व्यक्ति के पाकिस्तान सरकार से कनेक्शन तो हमेशा रहते हैं क्योंकि वह तो इनके लेखों को पढ़ने से ही पता चल जाता है जिनमें यह जनरल अयूब, जियाउल हक, बेनजीर, मुर्शरफ, और दूसरे राजनैतिक व्यक्तियों से मुलाकात का जिक्र करते हैं । हो सकता है कि ये भारत सरकार की गुप्त सूचनाएं भी इधर उधर करते हों ।

के द्वारा: kmmishra

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: shab

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: Munish

के द्वारा: abhishek

के द्वारा: sanjaykumar

भाई मुनीश जी, अपने इस आलेख में, भारत की राष्ट्रभाषा के संबंध में,आपने बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाये हॆं.कोई भी भाषा केवल भाषा मात्र नहीं होती,अपितु वह उस समुदाय की संस्कृति का वाहक भी होती हॆ, जिस समुदाय के द्वारा वह प्रयोग में लाई जाती हॆ.हिंदी भारत की ’राष्ट्रभाषा’ ऒर ’अंग्रेजी’अंतर्राष्ट्रीय भाषा-हॆ-यह भ्रांति देश के 90% से अधिक लोगों को हॆ.हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था हॆ.सभी फॆसले बहुमत से लिए जाते हॆं.आंकडों के हिसाब से देखा जाये तो ’विश्च’में सबसे अधिक बोली व समझी जाने वाली भाषाओं में-चीनी व अंग्रेजी के बाद हिंदी का तीसरा स्थान हॆ तथा भारत के संदर्भ में इसका पहला स्थान हॆ.देश के 50% से भी अधिक लोग जिस भाषा को बोलते व समझते हो-उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा न दिया जाना-राष्ट्रीय शर्म की बात हॆ.लोहिया जी ने हिंदी के संबंध में कहा था-’जो लोग-कहते हॆं कि वे इस देश में समाजवाद लाना चाहते हॆ-वे झूठ बोलते हॆं ऒर जो यह कहते हॆं कि देश में लोकतंत्र हॆं-वो लोगों को बेवकूफ बना रहे हॆं.बिना हिंदी को राजभाषा बनाये तो इस देश में ईमानदारी तक नहीं आ सकती". जब तक सरकारी मशीनरी आम जनता से बात-चीत या पत्राचार एक आम आदमी की भाषा(हिंदी) में नहीं करती-तो कॆसा लोकतंत्र? हिंदी भाषा से जुडे इसी तरह के अन्य सवालों पर बडी गहराई से चर्चा-प्रभाकर क्षोत्रिय की पुस्तक-’हिंदी:दशा ऒर दिशा’ में की गयी हॆ. राजभाषा ’हिंदी’ के विकास को लेकर मेरा भी एक छोटा सा प्रयास हे-’राजभाषा विकास मंच’-एक अन्य ब्लाग.यदि उचित समझें तो,इस विषय पर अपना रचनात्मक सहयोग दें.लिंक दे रहा हूं:- http://www.rajbhashavikasmanch.blogspot.com



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